राजधानी के पड़ोस के एक नेताजी हैं। सियासत के चारों धाम घूम चुके हैं। एकाध धाम अपना भी बना चुके।
जिस पार्टी में होते हैं, उसके नेता के पक्ष में ऐसे बिछे रहते हैं जैसे कि जन्मजात स्तुतिगायक हों। बहनजी हों तो क्या, नेताजी हों तो क्या?
बीते सप्ताह, मोहब्बत की नगरी में अपने ही मंत्री के खिलाफ पहले अंदरखाने में, फिर खुले में मोर्चा खोलने के कारण फिर चर्चा में आए हैं।
मंत्रीजी के एक कारिंदे ने 24 घंटे की सरकार तक में ईमान बदलने वाली बात याद दिलाकर आईना दिखाने की कोशिश की, तो फ्लैशबैक में कई बातें फिर लोगों की जुबान पर आ गईं।
एक किस्सा तो 24 घंटे की सरकार बनवाने वाले तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने इन नेताजी के बारे में अपनी आत्मकथा में दर्ज किया हुआ है। भंडारीजी भी बीते सप्ताह ही स्मृतिशेष हुए हैं।
विवादास्पद सरकार के बारे में उन्होंने इन नेता का जिक्र करते हुए लिखा है कि उन्होंने पलटी खा ली, इसलिए सरकार फुस्स हो गई।
वे मानते हैं, ऐसे नेता पर भरोसा करके मैंने गलती की थी, जो चुनाव में पिता के लिए पार्टी का सिंबल लेने गया था और उन्हें बीमार बताकर अपने नाम का सिंबल ले आया था। यानी जो उनका वफादार न हुआ, वह किसका होगा?