शासन में जंगल से जुड़े महकमे के बड़े साहब ऑफिस के लोगों के बीच चर्चा में बने हुए हैं। असल में यहां आने से पहले साहब एक बड़े पद पर रह चुके हैं।
जितना बड़ा पद उतनी ही बड़ी कंजूसी। बैठकों में चाय भी परची से आती है। ऐसे में ऑफिस के लोगों का परेशान होना लाजमी है। पहले जो साहब इस महकमे को देख रहे थे।
उनकी स्टाइल के सभी मुरीद थे। बगैर किसी तामझाम के लोग उनसे मिल सकते थे। वह अपने स्टॉफ का भी पूरा ख्याल रखते थे। बैठकों में चाय के साथ ही बिस्कुट और खाने-पीने की तमाम चीजें अधीनस्थों को भी मिल जाती थी।
चतुर्थ श्रेणी केकर्मचारी तो ज्यादा ही खुश रहते थे। क्योंकि साहब खाने-पीने की चीजें मंगाते थे और पैसा वापस भी नहीं लेते थे। जितना पैसा बचता था, वह कर्मचारियों की जेब में चला जाता था।
अब ये साहब हैं कि पैसे देने की बात दूर की रही। चाय भी परची से मंगाते हैं। बेचारे कर्मचारी क्या करें। साहब की कंजूसी की चर्चा करके ही भड़ास निकाल रहे हैं।