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मंदिर-मस्जिद और मठों पर बयान, किसका कितना नफा-नुकसान : विश्लेषक मान रहे चुनाव से पहले ध्रुवीकरण की कोशिशें

Tue, 01 Aug 2023 12:42 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अजित बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ

सार

सीएम योगी आदित्यनाथ ने ज्ञानवापी पर मुस्लिम समाज से भूल स्वीकार करने की अपेक्षा की है। इसे सत्ताधारी दल की सोची-समझी रणनीति के तहत दिया गया बयान माना जा रहा है।
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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कभी ज्ञानवापी तो कभी केदारनाथ-बद्रीनाथ पर बयान देश-प्रदेश में राजनीतिक लहरें पैदा कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव से ऐन पहले इस तरह की गर्माहट किसे और कितना नफा-नुकसान करेगी, यह तो भविष्य ही साफ करेगा। लेकिन, राजनीतिक विश्लेषक इसे लोकसभा चुनाव से पहले मतदाताओं के ध्रुवीकरण की कोशिशों के तौर पर ले रहे हैं। उन्हें आशंका है कि इन हलचल के तले चुनाव में कहीं रोजी-रोटी, रोजगार और बदलाव के असली मुद्दे न दब जाएं।

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सीएम योगी आदित्यनाथ ने ज्ञानवापी पर मुस्लिम समाज से भूल स्वीकार करने की अपेक्षा की है। इसे सत्ताधारी दल की सोची-समझी रणनीति के तहत दिया गया बयान माना जा रहा है। वहीं, मुख्य विपक्षी दल सपा भी इस तरह के बयान देने में पीछे नहीं है। उसके राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा को गढ़े मुर्दे न उखाड़ने की नसीहत दे रहे हैं। उनकी चेतावनी है कि अगर हर मस्जिद में मंदिर ढूंढोगे तो केदानाथ-बद्रीनाथ समेत हर धाम-मंदिर में बौद्ध मठ ढूंढा जाएगा।

अकादमिक मुद्दों पर राजनीति उचित नहीं : प्रो. रवि
जेएनयू के शिक्षक रहे और समकालीन यूपी के राजनीतिक मामलों के विश्लेषक प्रो. रवि श्रीवास्तव कहते हैं कि किसी भी इमारत की उम्र 100-150 साल ही होती है। हर मुल्क में पुराने धार्मिक स्थलों के खंडहरों पर नए उदित धर्मों या दूसरे धर्मों के मानने वालों ने अपनी मान्यता के अनुसार पूजा स्थल के रूप में भवन तैयार कराए। भारत में भी ऐसा हुआ, लेकिन यह विषय इतिहासकारों के बीच या अकादमिक बहस तक ही सीमित रहते तो समाज के लिए बेहतर रहते।
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प्रो. श्रीवास्तव का कहना है कि उत्तर प्रदेश में उस तरह का कभी दलित मूवमेंट नहीं रहा, जैसाकि महाराष्ट्र में रहा। इसलिए स्वामी प्रसाद का बौद्ध मठों को लेकर दिया गया बयान राजनीतिक रूप से कोई फायदा पहुंचा पाएगा, इसमें संशय है। लेकिन, इस तरह के बयान भाजपा की राजनीति को हवा-पानी और खुराक मुहैया कराते हैं। धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण भाजपा को ही फायदा पहुंचाएगा और फिलहाल यूपी में जातिगत ध्रुवीकरण या इस आधार पर कोई मूवमेंट खड़ा होता नहीं दिख रहा है।

अपने-अपने आधार वोट को मजबूत करने की रणनीति : प्रो. संजय गुप्ता
राजनीति शास्त्री प्रो. संजय गुप्ता कहते हैं कि इन मुद्दों को उभारकर एनडीए और इंडिया दोनों लोकसभा चुनाव में फायदा लेना चाहते हैं। हालांकि, ज्ञानवापी का मुद्दा पिछले एक-डेढ़ साल से गर्माया हुआ है, इसलिए इसे चुनाव से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। फिर भी राजनेताओं के बयान धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिशों का नतीजा है। दोनों ही पक्ष इससे न सिर्फ अपने-अपने आधार वोट बैंक को न सिर्फ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि उसे इधर-उधर खिसकने से बचाने की कोशिशों में भी लगे हैं। एमआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति जहां सपा को आशंकित कर रही है, वहीं अगड़े-पिछड़े के आधार पर विभाजन हुआ तो भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है। राजनेताओं के मौजूदा बयानों को इन समीकरणों से जोड़कर देखना अनुचित नहीं कहा जा सकता।

धर्म स्थलों को राष्ट्रीय मुद्दा बनने से रोकें : डॉ. अरशद
पसमांदा मूवमेंट से जुड़े जेएनयू के पूर्व शिक्षक डॉ. अरशद आलम कहते हैं कि यह एतिहासिक हकीकत है कि ज्ञानवापी कभी मंदिर था। इसलिए मुसलमानों को इस पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए। डॉ. अरशद कहते हैं कि अयोध्या के मामले में भी शुरू से ही उनका यही मत था। स्थानीय मुद्दों को हम अपनी जिद के कारण राष्ट्रीय मुद्दा बना देते हैं, जैसाकि अयोध्या में हुआ और अब काशी में हो रहा है। इससे रोजगार, रोटी और शिक्षा के मौजू सवाल पीछे छूट जाते हैं। मुसलमानों की भी भलाई इसमें है कि स्थानीय मुद्दा, राष्ट्रीय स्तर पर न छाए।

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