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बाल श्रमिकों के सपने मंच पर हुए रोशन

Fri, 19 Sep 2014 03:12 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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समाज में अपने आसपास काम करते छोटे बच्चों को देखकर कम ही लोगों को उनकी मन:स्थिति की अनुभूति होती है।
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शायद इसी को समझते हुए प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से आए 35 बच्चों ने अपने ही जैसे बच्चों से जुड़ी बच्चों की समस्याओं को उठाने के लिए लखनऊ में गुरुवार को लघु नाटक प्रस्तुत किए।

उन्होंने बताया कि इन बच्चों के भी अपने सपने हैं। उनके हृदय भी कोमल हैं। बेहतर जीवन की लालसा उनमें भी है और सबसे अहम इनकी संख्या, जो करीब 18 लाख है।

भारतेंदु नाट्य अकादमी में चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) ने वॉइस ऑफ पीपल से मिलकर यह कार्यक्रम आयोजित किया था। इन बच्चों ने तीन दिन की कार्यशाला के दौरान रंगकर्मी वॉल्टर पीटर के साथ प्रशिक्षण लेकर इन नाटकों को तैयार किया था।
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उन्होंने ‘काम है इतना.नहीं बचा सपना’ के जरिये बाल मजदूरों, ‘बचपन का मतलब आजादी.न चूल्हा, चौका, शादी’ के जरिये बाल विवाह और ‘ना अता, ना पता. है लापता’ लघु नाटक के माध्यम से लावारिस बच्चों के हालात को सामने रखा।

नाटिकाओं के बाद एक विचार गोष्ठी आयोजित की गई। इसमें क्राई के विभागीय एजीएम पंकज मेहता ने कहा कि मौजूदा आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश देश में बच्चों के लिए सबसे खराब जगह हैं।

सुरक्षित बचपन के लिए उत्तर प्रदेश को अभी बहुत काम करने की जरूरत है। वहीं, वीओपी की संयोजक श्रुति नागवंशी ने बच्चों से जुड़ी समस्याओं में प्रशासनिक व सरकार के तंत्र की असंवेनशीलता का मुद्दा उठाया और कहा कि जब तक सरकार की जवाबदेही तय नहीं होती बच्चों के लिए सुरक्षित सिस्टम के लिए सोचा भी नहीं जा सकता।
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बाल अधिकार एक्टिविस्ट वनिका करोली का कहना था कि शोषण और अपराध पीड़ित बच्चों को समाज में लौटने में समय लग जाता है, यह उनके भविष्य को भी बिगाड़ सकता है। ऐसे में जरूरी है कि हालात को सुधारने के लिए ज्यादा गंभीर प्रयास हों।
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