क्राइम सीन का रीक्रिएशन 17 मिनट तक चला। एसआईटी और फॉरेंसिक टीम ने दोपहर करीब तीन बजे ही घटनास्थल पहुंचकर क्राइम स्पॉट को घेर लिया था। इस रास्ते पर आने-जाने वाले वाहनों को दूसरी ओर से भेजा गया।
ठीक 3.45 बजे विवेक की पूर्व सहकमी, कल्पना और विष्णु शुक्ला एक ही कार से पहुंचे। पूर्व सहकर्मी ने एसआईटी टीम को कार के खड़े होने के स्थान, सिपाहियों के सामने से बाइक से आने और वाहन खड़ी कर गोली मारने तक के बारे में जानकारी दी। इसके बाद 4.02 मिनट पर कल्पना और उनके परिवारीजन व पूर्व सहकर्मी चले गए।
क्राइम सीन क्रिएट करती एसआईटी
एसआईटी प्रभारी ने बताया कि वारदात के वक्त विवेक अपनी एक्सयूवी 500 में थे और सिपाहियों के पास अपाचे बाइक थी। क्राइम सीन के रीक्रिएशन में कोई चूक न हो, इसलिए वैसे ही वाहन मंगाए गए। पहले सहारागंज चौकी प्रभारी राहुल सोनकर से सिल्वर रंग की उसी मॉडल की एसयूवी मंगाई गई थी। बाद में गोमतीनगर के प्रभारी निरीक्षक ने काले रंग की एक्सयूवी 500 का इंतजाम होने की बात कही तो आईजी ने उसी का इस्तेमाल करने को कहा।
विवेक की पूर्व सहकर्मी ने एसआईटी के अधिकारियों को घटना के बारे में जो जानकारियां दीं, उसमें कार के बाइक में टक्कर मारने और सिपाहियों को कुचलने के प्रयास की बात सामने नहीं आई। पूर्व सहकर्मी का कहना था कि कार खड़ी थी और बाइक सामने से आकर रुक गई।
बाइक रुकने के बाद एक सिपाही उसकी तरफ व एक सिपाही विवेक की तरफ खिड़की पर आ गया। सिपाहियों ने गाली-गलौज की। विवेक ने विरोध किया तो वह भड़क गए और सामने जाकर गोली चला दी। इससे साफ है कि पुलिस के अधिकारी शुरुआत से ही सिपाहियों की बाइक को टक्कर मारने और उन्हें कुचलने की फर्जी कहानी गढ़ रहे थे।
क्राइम सीन क्रिएट करती एसआईटी
हत्याकांड की एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी ने एफआईआर में लिखाया था कि उसने गोली चलने जैसी आवाज सुनी। यानी, उसने किसी को गोली चलाते नहीं देखा था। सिर्फ एक आवाज सुनी थी जिसे उसने फायर माना। गोली का अंदाजा उसे तब हुआ, जब मौके से भागे विवेक की कार कुछ दूर अंडरपास के खंभे से टकराकर रुकी।
पूर्व सहकर्मी ने खून देखा तब उन्हें अहसास हुआ कि विवेक को गोली लगी है। हालांकि, मंगलवार को रीक्रिएशन के दौरान उन्होंने सिपाही के सीधे कार के सामने खड़े होकर गोली मारने की जानकारी दी। इससे स्पष्ट है कि पूर्व सहकर्मी ने जो एफआईआर लिखाई थी, वह पुलिस अधिकारियों का खेल था। उस वक्त उसने कागज पर जो भी लिखा था, अधिकारियों के कहने पर लिखा था।
क्राइम सीन के रीक्रिएशन में एसआईटी उस जगह को भूल गई, जहां विवेक की कार टकराकर रुकी थी। सिर्फ घटनास्थल पर कार और बाइक की पोजीशन, गोली चलाने वाले सिपाही की दूरी, पिस्टल की कार से दूरी व ऊंचाई के बारे में ही अध्ययन किया। उक्त स्थान पर ठोड़ी से घुसकर गोली के गले में फंसने और खून निकलने के बावजूद विवेक दो मोड़ मुड़कर करीब 400 मीटर दूर कैसे पहुंचे? यह जानने की एसआईटी ने कोशिश नहीं की। विवेक की पूर्व सहकर्मी को गोली मारने वाली जगह से ही घर भेज दिया गया। आगे सिर्फ एसआईटी प्रभारी, आईजी रेंज सुजीत पांडेय और अन्य पुलिस अधिकारी के अलावा विवेक के चचिया ससुर ही गए, वह भी कार के बगैर। करीब 10 मिनट घटनास्थल देखने के बाद सभी लौट गए।