विधान परिषद स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र के चुनाव को लेकर सपा ने गोलबंदी शुरू कर दी है। पार्टी के विधायकों, सांसदों, पूर्व सांसदों व अन्य वरिष्ठ नेताओं को ब्लॉकवार जिम्मेदारी दी जा रही है। इसी के आधार पर पार्टी इन नेताओं के कद का भी मूल्यांकन करेगी।
परिषद की 36 सीटों में से 33 पर सपा के एमएलसी थे। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सात भाजपा में चले गए। इनमें चार को भाजपा प्रत्याशी बना चुकी है। सपा ने भी पहले चरण में शामिल 30 सीटों के लिए घोषणा कर दी है। अब 21 को नामांकन होने के बाद पार्टी ब्लॉकवार प्रभारी बनाएगी। यदि एक ही ब्लॉक में कई वरिष्ठ नेता हैं तो उनकी वरिष्ठता के आधार पर प्रभारी और सह प्रभारी तय किए जाएंगे। 26 मार्च को प्रदेश कार्यालय में होने वाली बैठक में किस क्षेत्र में कितने प्रधान, पंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्य, पार्षद हैं, इस पर चर्चा की जाएगी।
क्या हैं चुनौतियां
पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि इस बार परिषद चुनाव चुनौतीपूर्ण है। क्योंकि प्रदेश के 67 जिला पंचायत अध्यक्ष भाजपा अथवा उसके समर्थित हैं। इसमें अवध की 13 में 13 और कानपुर- बुंदेलखंड की 14 में 13, ब्रज की 12 में 11, पश्चिम में 14 में 13, काशी क्षेत्र 12 में 10 और गोरखपुर में 10 में सात जिलों में भाजपा अथवा उनके समर्थित जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। इसी तरह ज्यादातर ब्लॉक प्रमुख भी भाजपा समर्थित हैं। मालूम हो कि प्रदेश में ग्राम प्रधानों की संख्या 58189, बीडीसी की 75852, जिला पंचायत सदस्य की 3050 और सभासद 12007 हैं।
मानदेय का मुद्दा
सपा इस चुनाव में पंचायत प्रतिनिधियों के मानदेय का मुद्दा जोरशोर से उठाएगी। जो उम्मीदवार नामांकन कर चुके हैं, वे जनसंपर्क के दौरान इसे उठा भी रहे हैं। मतदाताओं को समझाया जा रहा है कि 1994 में सपा सरकार के कार्यकाल में ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत अध्यक्ष और नगर पालिका व पंचायत चेयरमैन को मानदेय देने की शुरुआत हुई थी। 2012 में सपा के सत्तासीन होने पर मानदेय में बढ़ोत्तरी की गई।
ग्राम प्रधान को 3500, ब्लॉक प्रमुख को सात हजार, जिला पंचायत अध्यक्ष, नगर पंचायत व पालिका चेयरमैन को 15 हजार रुपये के मानदेय के अलावा यात्रा भत्ता अलग से मिलता है। विभिन्न संगठनों की ओर से क्षेत्र पंचायत सदस्य (बीसीडी), पार्षद, सभासद और जिला पंचायत सदस्यों को भी मानदेय देने की मांग की जा रही है। सपा के विधान परिषद सदस्य हीरालाल यादव का कहना है कि वह नियम 110 के अंतर्गत मानदेय बढ़ाने का मुद्दा सदन में उठाते रहे हैं।