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नगर निगम में सपा और कांग्रेस पार्षदों से भिड़े बीजेपी पार्षद, सदन के अंदर फोड़े गए कांच के गिलास

Mon, 19 Nov 2018 08:45 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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सदन के बाहर नारेबाजी करते कांग्रेस पार्षद
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14वें वित्त के बजट से करीब 114 करोड़ रुपए की लागत से कराए जाने वाले विकास कार्यों में सांसदों और विधायकों के काम शामिल किए जाने को लेकर सोमवार को नगर निगम सदन से लेकर महापौर के आफिस तक भारी बवाल हुआ।

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सपा पार्षद दल नेता की विधायकों को लेकर आपत्ति पर भाजपा पार्षद भड़के गए। दोनों ओर से हंगामा हुआ। इसी बीच भाजपा षार्षदों के प्रस्ताव पर महापौर ने बजट को पास कर दिया और सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी। उससे विवाद और भड़क गया।

सत्तापक्ष पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए सपा और कांग्रेस के पार्षद सदन के अंदर धरना पर बैठ गए। महापौर मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे और बजट की प्रतियां फाड़ कर फेंक दी। सदन में अध्यक्ष (महापौर) के मेज पर रखे पानी पीने के लिए रखे कांच के गिलास तोड़ डाले।
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सदन में हंगामा बढ़ने पर महापौर भाजपा पार्षदों के साथ सदन से बाहर निकलकर अपने आफिस में चली गईं। करीब 10 मिनट तक सदन मे ही ‘महापौर संयुक्ता भाटिया मुर्दाबाद’ के नारे लगाने के बाद सपा और कांग्रेस पार्षद हंगामा करते हुए महापौर अफिस के बाहर पहुंच गए।

यहां पर कमरे के सामने मोहम्मद सलीम, शैलेंद्र सिंह बल्लू, अमिता सिंह, ममता चौधरी, राजकुमार सिंह राजा सहित करीब दो दर्जन पार्षद धरना पर बैठ गए और नारेबाजी शुरू कर दी। कुछ पार्षद मेयर के कमरे में जाने लगे तो सुरक्षा कर्मी ने उनका रोकने का प्रयास किया तो पार्षद और भड़क गए।

वहीं आफिस के बाहर धरना प्रदर्शन से नाराज भाजपा पार्षदों ने भी पहले तो महापौर के आफिस के अंदर से नारेबाजी की और फिर उसके बाद कमरे से बाहर आकर करने लगे। इससे दोनों पक्ष आमने -सामने आ गए। स्थिति यह हो गई दोनों पक्षों के बीच धक्का-मुक्की, हाथापाई की नौबत दिखने लगी।

एक तरफ सपा और कांग्रेस के पार्षद महापौर मुर्दाबाद तो दूसरी ओर भाजपा पार्षद महापौर जिंदाबाद और जय श्रीराम के नारे जोर-जोर से लगने लगे। इससे तनाव बढ़ता देख भाजपा और सपा के कुछ वरिष्ठ पार्षदों के साथ ही नगर निगम के एक कर्मचारी नेता सत्येंद्र सिंह ने भी पार्षदों के बीच आकर दोनों पक्षों को समझाया। उसके बाद विवाद शांत हुआ।

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14वें वित्त के बजट पर पार्षदों का हक

नारेबाजी करते कांग्रेस व सपा पार्षद
सत्ता पक्ष हमेशा जनहित के मसलों पर चर्चा से भागता रहता है। 14वें वित्त का पैसा जब नगर निगम को मिलता है और सदन उस बजट को पास करता है तो उस पर पार्षदों का हक है। सांसदों और विधायकों का नही अगर उनको काम कराना है तो वह अपना कोटा दें या सरकार से अलग से बजट लाएं। सत्तापक्षा ने बहुत का दुरुपयोग करते हुए तानाशाही रवैया अपनाते हुए बजट को पास किया है। यह स्वस्थ लोकतंत्र नहीं है।
यावर हुसैन रेशू, नेता सपा पार्षद दल

सांसद-विधायक आखिर कहां लगा रहे अपना कोटा
शहर में तो विधायक सांसदों के द्वारा कराए जाने वाले कार्यों के पत्थर तो दिखते नहीं हैं आखिर वह अपना कोटा लगाते कहां। शहर में जब काम नहीं करा रहे तो क्या स्कूलों में अपना पूरा कोटा लगा रहे हैं। नगर निगम अगर पार्षदों की बजाए विधायक-सांसदों के कहने पर लिस्ट बनाएगा और उनके काम कराएगा तो विरोध तो होगा। पार्षद तो सांसद या विधायक की निधि से काम नहीं कराता है।
ममता चौधरी, नेता कांग्रेस पार्षद

विरोध गलत, सांसद-विधायक भी सदन के सदस्य
सांसद-विधायक भी नगर निगम के पदेन सदस्य हैं। पहले भी विधायक-सांसद के कहने पर काम कराए जाते रहे हैं। तो फिर अब विरोध का कोई औचित्य नही है। जिस तरह एक पार्षद अपनी निधि से सभी विकास कार्य नहीं करा पाता है  वही समस्या सांसद-विधायक केसामने होती है। नगर निगम के अलावा दूसरे विभागो में सांसद-विधायक विकास कार्य के लिए पत्र लिखते हैं।
रामकृष्ण यादव, उपनेता भाजपा पार्षद दल
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