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सपा में महादंगल पर मुसलमान परेशान पर अखिलेश से हमदर्दी!

Tue, 10 Jan 2017 02:13 AM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव - फोटो : amar ujala
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स्थापना के 25वें साल में समाजवादी पार्टी के दो फाड़ होने, दफ्तरों पर कब्जे की लड़ाई और कार्यकर्ताओं के आमने-सामने आने से मुसलमानों में बेचैनी है। कभी मुसलमानों की पैरोकारी करने पर मौलाना और मुल्ला जैसे खिताबों से नवाजे गए मुलायम सिंह और उनके मुख्यमंत्री बेटे अखिलेश यादव के बीच अध्यक्ष पद की जंग से उनमें हैरानी है तो मायूसी भी।
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वे असमंजस में हैं, किसके साथ खड़े हों। परिवार की इस जंग का फायदा उठाने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती मुसलमानों की हमदर्द बनकर ताल ठोक रही हैं। 97 मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर उन्होंने अपने इरादे भी जाहिर कर दिए हैं।

सूबे की सियासत में 19 फीसदी से ज्यादा मुसलमान सत्ता बनाने, बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं। समाजवादी पार्टी की स्थापना के बाद से ही मुसलमान सपा व मुलायम सिंह को अपना हमदर्द और रहनुमा मानते रहे हैं।
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इसकी वजह भी है। 1990 में रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के समय उनका रुख बड़ा साफ था। जब नारे लगते थे, ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ तब मुलायम ने कहा था कि कानून और संविधान के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाने दिया जाएगा।

कारसेवकों पर गोलियां चलवाने के कारण बने मुस्लिमों के रहनुमा

मुलायम ‌सिंह यादव - फोटो : amar ujala
उन्होंने कहा था, अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता। विवादित स्थल को बचाने के लिए उनके मुख्यमंत्रित्व काल में ही कारसेवकों पर गोलियां चली थीं। इसके बाद उनकी सरकार चली गई थी।

अल्पसंख्यकों में संदेश गया था कि बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए उन्होंने अपनी कुर्सी कुर्बान कर दी। यही वह दौर था जब उन्हें मौलाना मुलायम कहकर पुकारा जाने लगा। 1991 में हुए चुनाव में उन्हें झटका लगा। भाजपा की सरकार बनी।

1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी का गठन किया। सपा के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्हें पहली बार बेटे अखिलेश से चुनौती मिली है। कई माह से चल रही परिवार की जंग 1 जनवरी को पार्टी के बंटवारे के रूप में सामने आई। सपा के दो खेमों में बंटने से ही मुसलमान असमंजस में हैं।

अखिलेश समर्थकों ने राष्ट्रीय सम्मेलन कर मुलायम की जगह उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया। सुलह की कोशिशें हुईं, पर सब बेनतीजा रहीं। अब पिता-पुत्र के बीच अध्यक्ष पद के लिए जंग चल रही है। मामला निर्वाचन आयोग में पहुंच चुका है।

अखिलेश-मुलायम दोनों के साथ है उनकी हमदर्दी

प्रदेश कार्यालय ही नहीं उनके गृह जनपद इटावा समेत जिलों-जिलों में दफ्तरों पर कब्जे हो रहे हैं। सपा के इन हालातों से मुस्लिम व्यथित हैं। उनकी हमदर्दी अखिलेश और मुलायम दोनों के साथ है। वे उनमें टकराव नहीं एकता चाहते हैं।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और एएमयू कोर्ट के सदस्य खालिद मसूद कहते हैं, मुसलमान सपा को वोट करना चाहता है, पर मुलायम-अखिलेश के झगड़े से वे डिस्टर्ब हुए हैं। मुलायम मुसलमानों के रहनुमा बनकर उभरे।

मुस्लिमों में उनके प्रति सम्मान है। घर में वर्चस्व की लड़ाई से नुकसान हो रहा है। मुलायम यदि चुनाव में अखिलेश के खिलाफ निकले तो उन्हें बड़ा नुकसान हो सकता है।

खालिद मसूद कहते हैं कि मुसलमानों को सपा से हमदर्दी है, पर वे उसके जरखरीद गुलाम नहीं हैं। सपा में फूट के बाद भाजपा को हराने के लिए मुसलमान कोई दूसरा रास्ता चुन सकते हैं। ऐसे में उसके सामने केवल बसपा का विकल्प बचेगा।

घर के झगड़े से मुस्लिमों की दुविधा बढ़ी

एएमयू के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद सज्जाद कहते हैं कि निचले स्तर तक बातचीत का निष्कर्ष यह कि मुस्लिम यूथ का रुझान अखिलेश यादव की तरफ है। पौने पांच साल में शासन-प्रशासन में जो कमियां रही हैं, उन्हें शिवपाल यादव के मत्थे मढ़ा जा रहा है।

युवा कह रहे हैं कि शिवपाल का साया न होता तो अखिलेश और बेहतर काम करते। मुस्लिमों का एक वर्ग बसपा की तरफ भी देख रहा है। हालांकि मुस्लिमों की शिकायत है कि मायावती केवल चुनाव के समय एक्टिव होती हैं। मुलायम व अखिलेश के झगड़े से मुसलमान दुविधा में आए हैं। किसे वोट करेंगे, इसे लेकर अभी असमंजस है।

ज्यादातर लोग सपा के पक्ष में दिख रहे थे, पर अब ऐसा लगता है कि आखिरी समय में मुसलमान भाजपा को हराने वाले प्रत्याशी को वोट करेंगे। हां, मुख्यमंत्री के रूप में मुसलमानों में मायावती से ज्यादा पसंदगी अखिलेश की है। हालांकि वह यह भी कहते हैं कि अभी यह आकलन नहीं हो पाया है कि दलित-मुस्लिम समीकरण धरातल पर उतरेगा या नहीं।
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बसपा-एआईएमआईएम की नजर मुस्लिम वोटरों पर

बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : amar ujala
बसपा इस बार दलित-मुस्लिम समीकरण बनाकर चुनाव में उतरना चाहती है। इसके लिए बहुत पहले से काम चल रहा है। बसपा के नेता मानते हैं कि सपा के पारिवारिक विवाद से उनकी राह आसान हो सकती है। बसपा ने इसी को ध्यान में रखकर सर्वाधिक 97 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे हैं।

पश्चिमी यूपी में सर्वाधिक मुस्लिमों को पार्टी ने टिकट दिया है। पश्चिमी यूपी के एक दर्जन जिलों में मुस्लिम आबादी 25 से 51 फीसदी के बीच है।

पर, ऑल इंडिया इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष असदउद्दीन ओवैसी भी प्रदेश में सक्रिय हैं। उनकी नजर भी सपा से दूर होते मुस्लिम वोटों पर है। उलमा कौंसिल समेत मुस्लिमों में काम करने वाले कुछ अन्य दल भी सक्रिय हो गए हैं।

विधानसभा में मुस्लिम विधायक
2007--56
2012--64
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