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लखनऊ डायरी: पढ़ें, यूपी की चुनावी चकल्लस के 9 रोचक किस्से

Mon, 09 Jan 2017 10:41 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : demo pic
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फार्म में बड़बोले चौधरी
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बलिया वाले बड़बोले चौधरी आजकल पूरे फार्म में हैं। समाजवादी कुनबे में चल रहे झगड़े से उनकी पौ बारह हो गई है। बहुत हाथ-पांव मारने के बाद भी ‘सरकार’ के दरबार में एंट्री नहीं मिली, सो नेताजी के पाले में जा खड़े हुए। नेताजी ने थोड़ा भाव क्या दे दिया, चहकने लगे। नेताजी के घर के बाहर मीडिया का मजमा था। चौधरी निकले तो मीडिया ने घेर लिया।

बड़े आत्मविश्वास से बोले-बातचीत चल रही है। सब कुछ ठीक हो जाएगा। थोड़ी दूर पर खड़े ‘सरकार’ के समर्थक ने चुटकी ली- लो भाई अब ये कराएंगे सुलह। बड़े-बड़े हार गए। इनकी क्या बिसात? इन्हें तो बोलने का मौका चाहिए। बस टीवी चैनलों पर नजर आ जाएं, यही काफी है। लोग जान तो जाएंगे कि चौधरी साहब भी सक्रिय हैं। कम से कम सियासी दुकान चलती तो रहेगी।
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तो नौ से आएंगे अच्छे दिन?

सरकार को कानूनी राय देने वाले एक हाकिम ज्योतिष का भी कुछ-कुछ ज्ञान रखते हैं। उनकी भविष्यवाणी है कि नौ जनवरी से सूर्य का प्रभाव बढ़ने वाला है। इसके साथ ही वजीर-ए-आला की ताकत अचानक बढ़नी शुरू हो जाएगी। जो-जो लोग मुखालफत में लगे हैं, सरेंडर कर देंगे।

ग्रह-नक्षत्र के स्थान का फल मानें तो सत्ता में दोबारा वापसी का संकेत साफ है। हालांकि ज्योतिष से इतर वे कहते हैं कि आज के हिसाब से तो सब गुड़-गोबर नजर आ रहा है। वैसे भी सियासत में परिस्थितियां और समीकरण से हार-जीत तय होती है और वह कब-कैसे बनने लगे, अंदाजा लगाना आसान नहीं होता है।

...और कर दिया कर्नाटक रवाना
एक एमएलसी साहब अच्छे लॉबिस्ट माने जाते हैं। ‘सरकार’ एक बार नाराज हुए तो उन्हें सलाहकार पद से हटा दिया। बाद में वह नेताजी का आशीर्वाद पाकर एमएलसी हो गए। इधर पिता-पुत्र विवाद में उनकी सक्रियता फिर चर्चा में आने लगी थी।

सरकार ने उन्हें धीरे से कर्नाटक की यात्रा पर रवाना कर दिया। दिलचस्प यह कि वह न तो सरकार में मंत्री हैं और न ही किसी सरकारी पद पर, लेकिन उनका भाव बढ़ाकर उनके नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल भेजने का दांव चला गया। वह मना भी नहीं कर पाए।

एक अफसर मजा लेते हुए कहते हैं, बिना कुछ कहे उन्हें इस संग्राम से बाहर करने का इससे आसान रास्ता भला क्या हो सकता था? जब तक वह लौटेंगे, तब तक बहुत कुछ रास्ते पर आ जाएगा।

किधर रहेंगे खां साहब

बाप-बेटे के बीच ‘साइकिल’ की जंग में खां साहब किस पाले में रहेंगे? यह सवाल समाजवादी सर्किल में लोग एक-दूसरे से पूछ रहे हैं। इसकी वजह भी है। उन्होंने किसी खेमे के पक्ष या विरोध में दस्तखत नहीं किए। बंटवारे से पहले न बेटे द्वारा बुलाई गई बैठक में पहुंचे और न ही ‘नेताजी’ की।

यह अलग बात है कि सुलह कराने के लिए वह लगातार दोनों से मिल रहे हैं। ‘नेताजी’ से मिलने गए तो बाहर खड़े साइकिल सवार बहस में उलझे थे कि ‘रफीकुल मुल्क’ को वह कैसे छोड़ेंगे। साथ नहीं छोड़ेंगे तो उनके करीबी ‘दल्ले’ और ‘नाली के कीड़े’ से कैसे मुक्ति पाएंगे।

एक नेता ने कहा, पाला चुनने में दुविधा है, इसीलिए सुलह की दुआ कर रहे हैं, कभी वजीर-ए-आला तो कभी रफीकुल मुल्क के दर पर दस्तक दे रहे हैं। देखना है उनकी दुआ कुबूल होती है या नहीं।

भगवा ब्रिगेड के सेकुलर तारणहार

प्रदेश चुनाव समिति का एलान क्या हुआ, भगवा खेमे में हलचल मची हुई है। यह समिति टिकट के दावेदारों की सूची फाइनल करके मंजूरी के लिए दिल्ली भेजती है। सूची में दलबदलुओं को जगह क्या मिली, काडर वाले बेचैन हैं।

बात इतनी बढ़ी कि ‘अपनों’ की उपेक्षा को लेकर खून से खत लिखे जाने लगे। भगवा खेमे के दफ्तर में दुखड़ा रोने वाले भी कम नहीं हैं। बोले, मोदी-शाह युग में ये पार्टी के सेकुलर तारणहार हैं। ढाई साल पहले 73 सांसद जिताने में इनकी जरूरत नहीं पड़ी थी, लगता है अब ये ही कमल खिलाएंगे?
 
...अपने ही गिराते हैं नशेमन पे बिजलियां
अपने ही गिराते हैं नशेमन पे बिजलियां...।‘आखिर क्यों’ फिल्म का यह गाना पंजे वाली पार्टी के एक युवा नेताजी को रह-रहकर याद आ रहा है। ये नेताजी राजधानी की एक सीट से टिकट मांग रहे थे। पिछले दिनों टिकट के दावेदारों के नामों पर विचार के लिए इलेक्शन कमेटी की बैठक थी। नेताजी के नाम के पीछे ‘शान’ जुड़ा हुआ है, इसलिए वे रहते भी शान से हैं।

उन्हें लग रहा था कि कमेटी के ज्यादातर सदस्य उनके  जानने वाले हैं। लिहाजा उनके नाम पर सभी सहमत हो जाएंगे। सो सबसे ज्यादा आत्मविश्वास में थे। बाद में पता चला कि मीटिंग में उनके खास लोगों ने ही उनके नाम का विरोध कर दिया। इसके बाद से नेताजी मायूस हैं। सोच में पड़ गए हैं कि राजनीति में कौन अपना है, कौन पराया, कैसे पहचानें।

नई करेंसी से धुल गए दाग

नोटबंदी के विरोध में सबसे मुखर एक राजनीतिक दल में चर्चा आम है कि जिसके पास नई करेंसी का खजाना है, उस पर लगे सारे दाग अब पार्टी सुप्रीमो को ‘अच्छे’ लगने लगे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में शराब माफिया से माननीय बनने के जुगाड़ में लगे एक ऐसे ही दावेदार का टिकट काट दिया गया था।

इस बार उन्हें टिकट देने की चर्चाएं शुरू हो गई हैं क्योंकि इस कड़की के जमाने में भी शराब के धंधे के चलते इनके पास नई करेंसी का भंडार है। लोग चुटकी ले रहे हैं कि जिसके पास नई करेंसी होगी, उसके दाग स्वत: धुल जाएंगे।

इस दावेदार को जहां से टिकट देने की चर्चा है, उससे सटी हुई सीट से भी पार्टी के उसी पूर्व एमएलसी को टिकट दिया गया है, जिनका नाम पूर्वांचल के चर्चित माफिया में है। इसलिए पार्टी सुप्रीमो को विश्वास हो गया है कि दोनों माफिया अगल-बगल वाली सीट से लड़ेंगे तो नई करेेंसी के साथ ही दोनों सीटें भी पार्टी के खाते में आ सकती हैं।

‘थोड़ा है, थोड़े की जरूरत है’
सूबे की नौकरशाही में ‘बाबा’ के नाम से विख्यात एक साहब इन दिनों ‘थोड़ा है, थोड़े की जरूरत है’ गीत गुनगुना रहे हैं। घर मकान बनाने वाले महकमे की जिम्मेदारी पहले से उनके पास थी। वजीर-ए-आला ने अब सड़क बनाने वाले महकमे की भी जिम्मेदारी सौंप दी। नई जिम्मेदारी मिलने पर जो भी उन्हें बधाई देने पहुंच रहा था, उससे एक ही बात कहते रहे,‘अरे ये सब तो आप लोगों की दुआओं का असर है, दुआ करो कि मेरे पदनाम में से अपर हट जाए’।
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हारना है तो फिर काहे का डर

बाएं बाजू वाली पार्टियों की मीटिंग चल रही थी। पूछा जा रहा था कि किस पार्टी को कितनी सीटों पर चुनाव लड़ना है। बेहद कम जनाधार वाली एक पार्टी ने सबसे ज्यादा 70 सीटों पर प्रत्याशी उतारने की बात कही।

साझीदार पार्टियों के नेता भौंचक्के रह गए। पूछने लगे, इतनी ज्यादा सीटों पर कैसे लड़ोगे। कहां से जुटाओगे संसाधन। सबसे ज्यादा सीटों पर लड़ने की बात कहने वाले से भी न रहा गया। तैश में बोले-हारना ही तो है। चाहे 7 पर हारो या 70 पर। फिर लड़ने से काहे का डर।

...ताकि बना रहे भाव
फूल वाली पार्टी के नेताओं में दिल्ली में होने वाली कार्यसमिति की बैठक में जाने की होड़ मच गई। तमाम नेता बिन बुलाए ही चले गए। नतीजतन यहां जिस कार्यालय में हुजूम उमड़ा रहता था, वहां कर्मचारी ही रह गए।

दरअसल जो नेता यहां रह जाता, उसके बारे में माना जाता कि दिल्ली से उन्हें भाव नहीं मिल रहा है। इसके खतरे भांपकर हर नेता ने बाहर का रुख किया। कुछ तो वाकई दिल्ली गए और कुछ दिल्ली का बहाना बनाकर कहीं और निकल लिए...।
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