लखनऊ। गोमतीनगर स्थित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में मंगलवार को यूपी, उत्तराखंड और बिहार की स्थानीय बोलियों में लोकगीतों की प्रस्तुति हुई। लोकगीतों में जाति व्यवस्था, लैंगिक भेदभाव, शिक्षा और बेरोजगारी जैसी समस्याओं के साथ ही सामाजिक समरसता की झलक नजर आई। गीतकारों ने गांव की बोलियों में स्थानीय समस्याएं बखूबी उजागर की।
श्रुति संस्थान के अनुसार, कार्यक्रम में करीब 10 नए गीतों का विमोचन भी किया गया। बिहार के गायक कुमार निराला ने मगही भाषा में मोर अंखियां नींद नाही लोकगीत गाकर पलायन की पीड़ा और मजदूर वर्ग की कठिनाइयों को दर्शाया।
उत्तराखंड के गायक तारा सिंह ने कुमाऊंनी भाषा में बाखड़ी भैंसी नीला आकाशा लोक गीत की प्रस्तुति दी। यह गीत जंगल और पर्यावरण संघर्ष की कहानी कहता है। उत्तर प्रदेश के नरेंद्र ने टीम के साथ अवधी भाषा में महंगइया की प्रस्तुति दी। यह गीत रोजमर्रा की कठिनाइयों और जनता की वास्तविक स्थिति को सामने रखता है।