उषा विश्वकर्मा: संस्थापिका रेड ब्रिगेड
संघर्ष का एक सफर एक बुलंदी की ओर बढ़ चुका है। डेढ़ लाख से भी अधिक महिलाओं-बच्चियों को आत्मरक्षा की तकनीक सिखाई। उनमें आत्मविश्वास जगाया ताकि बेटियां सिर उठाकर चल सके। किसी के सहारे की उन्हें जरूरत न रहे। उषा के शुरुआती संघर्ष से लेकर आज तक की कहानी को फोर्ब्स ने अपने ताजा अंक में प्रकाशित किया है।
खुद के लिए तैयार होने का वक्त
उषा ने वर्ष 2011 से लड़कियों को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग देना शुरू किया था। उषा कहती हैं कि आज भी लड़कियां, महिलाएं प्रताड़ना झेलती रहती हैं, लेकिन बोलती नहीं, घुटती रहती हैं। हमें लगता है कि चुप्पी तोड़ने से ज्यादा जरूरी है कि उन्हें पहले खुद की रक्षा के लिए तैयार किया जाए और हम वही कर रहे हैं। उषा के मुताबिक, सुरक्षित महिलाएं सुरक्षित लखनऊ अभियान के तहत हम नि:शस्त्र सेनानी के नाम से लड़कियों के ग्रुप तैयार कर रहे हैं, जो सप्ताह में एक दिन का समय देकर अन्य लड़कियों को आत्मरक्षा के गुर सिखाएंगी व स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिकाओं के प्रति जागरूक करेंगी।
डॉ. सुचिता चतुर्वेदी।
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डॉ. सुचिता चतुर्वेदी, सदस्य, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग
ग्रेजुएट किया 1996 में। इसी के बाद शुरू हो गई थी सामाजिक पारी। डॉ. सुचिता चतुर्वेदी विद्यार्थियों से जुड़ी संस्थाओं से जुड़ गईं और उन्हें राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनाने के अभियान से जुड़ीं। सिलसिला लगातार जारी रहा।
फिलहाल पूरा ध्यान बच्चों के विकास पर
डॉ. सुचिता कहती हैं कि बच्चों-महिलाओं के साथ संवाद करने पर पता चला कि इन तक योजनाओं का लाभ इसलिए भी नहीं पहुंच पाता क्योंकि इनमें जागरूकता की कमी है। इस बीच नेहरू युवा केन्द्र से भी जुड़ी, वहां अल्पसंख्यक महिलाओं को उनके अधिकारों के लिए जागरूक करने का जिम्मा मिला। फिलहाल बाल अधिकार आयोग के सदस्य होने के नाते बच्चों के हक की लड़ाई लड़ रही हूं।
पूजा खत्री: फैशन डिजाइनर
पढ़ाई पूरी हुई, फैशन डिजाइनर बनने की चाह थी तो उसका कोर्स किया। फिर अपना रेडीमेड कपड़ों का काम शुरू कर दिया। आर्थिक जरूरतें तो पूरी हो रही थीं, लेकिन कुछ करना बाकी था। घरेलू हिंसा पीड़ित महिला और उसके बच्चों के अंधेरे भविष्य की चिंता ने उन्हें ऐसे पीड़ितों का मददगार बना दिया। कारोबार के साथ-साथ वे पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए भी लड़ रही हैं।
आर्थिक रूप से मजबूत होना ही हल
पूजा कहती हैं कि हम समस्या सुनते हैं, जरूरतें समझते हैं और फिर काउंसलिंग करते हैं। 3 सीटिंग में समझौता या फैसला हो जाता है। जिन महिलाओं के केस दर्ज नहीं हो पाते उन्हें मुकदमा दर्ज कराने में मदद करते हैं। आली और 181 का हमें सहयोग मिलता है। दूसरी सबसे बड़ी जरूरत है आर्थिक निर्भरता, इसलिए महिलाओं को ट्रेनिंग कराते हैं और काम दिलाते हैं।