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कसौटी पर मायावती का सुपरहिट फॉर्मूला

Thu, 15 May 2014 11:59 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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2012 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद भी बसपा सुप्रीमो मायावती ने फिर उसी फॉर्मूले को अपनाया है, ऐसे में एक बार फिर उनकी रणनीति कसौटी पर है। जी हां एक बार फिर बसपा के सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूलें पर जनता फैसला करेगी।
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‘बसपा सरकार ने दलितों, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यक समाज के साथ-साथ ब्राह्मण समाज और अपरकास्ट समाज की अन्य जातियों के हित व कल्याण के लिए काफी काम किए। पर, विरोधी पार्टियों ने खासकर ब्राह्मण समाज को गुमराह करने का प्रयास किया और इनमें काफी लोग गुमराह भी हो गए।

... लेकिन यह संतोष की बात है कि ब्राह्मण समाज को वर्तमान सपा सरकार से काफी पछतावा है और वे लोग अपने समाज को फिर से सुरक्षित व संरक्षित देखने के लिए बीएसपी से जुड़ने को तत्पर लगते हैं।
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... हमने एक बार फिर ब्राह्मण समाज को उनकी भागीदारी के हिसाब से 80 में से 19 टिकट देने का फैसला किया है।’

क्या फिर कामयाब होगा फॉर्मूला

2012 के विधानसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती के 18 अप्रैल 2013 को दिए भाषण के इस अंश का संकेत साफ था कि वह फेल हो चुके अपने सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले पर एक बार फिर बढ़ने जा रही हैं।

पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र के आवास पर आयोजित ‘ब्राह्मण समाज भाईचारा संगठन’ के इस प्रदेश स्तरीय पदाधिकारी सम्मेलन में ही मायावती ने फार्मूले के सबसे अहम हिस्से ब्राह्मणों को सबसे ज्यादा 19 सीटें देने और दलित व ब्राह्मण प्रत्याशियों वाली 36 सीटों पर सम्मेलन का ऐलान किया था।

बाद में जब चुनावों के लिए प्रत्याशियों की आधिकारिक सूची जारी करने का मौका आया तो उन्होंने सोशल इंजीनियरिंग के रंग को और गाढ़ा करने के लिहाज से ब्राह्मण समाज के प्रत्याशियों की संख्या 19 से बढ़ाकर 21 कर दी तो मुसलमानों को दूसरी पार्टियों में सर्वाधिक 19 टिकट दिए।

इसके अलावा सुरक्षित 17 सीटों पर दलितों के अलावा पिछड़ा वर्ग को 15 सीटें दी। बसपा नेताओं ने चुनाव में टिकट वितरण के इस प्रयोग को भुनाने की पूरी कोशिश भी की। पर यह कोशिश कितनी कामयाब हुई, इसके लिए 16 मई का इंतजार करना होगा।

उल्टा पड़ गया दांव

सोशल इंजीनियरिंग में इन फैक्टर का दिख सकता है असर प्रमोशन में आरक्षण- मायावती ने प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था लागू कराने के लिए केंद्र सरकार पर जोरदार दबाव बनाया।

इसका नतीजा ये रहा राज्यसभा से यह बिल पास हो गया। इससे सवर्णों को बड़ा झटका लगा और इसके खिलाफ देश भर में आंदोलन हुए।

मायावती ने इस बात को नजरंदाज करने की कोशिश की 2012 के विधानसभा चुनाव में झटका दे चुका सवर्ण समाज उनके इस कदम से नाराज होगा।

मायावती के स्टैंड से अपरकास्ट (ब्राह्मण, क्षत्रिय व अन्य सवर्ण जातियों) में नाराजगी फैली। भाजपा ने दलितों को अपनी ओर मोड़ने के लिए प्रमोशन में आरक्षण का लाभ पाने वाले नौकरीपेशा आम दलितों की जगह आम दलितों पर ध्यान दिया, जिन्हें इस कवायद से कोई फायदा नहीं हो रहा था।

भाजपा ने खड़ी की मुश्किलें

भाजपा ने आम दलितों को समझाया कि मायावती ने आरक्षित रिक्त पदों पर दलित युवकों को नौकरी देने की जरूरत नहीं समझी बल्कि जो आरक्षण के आधार पर नौकरी पा गए उन्हें दुबारा आरक्षण देकर प्रमोशन दिलाने की लड़ाई लड़ रही हैं।

यदि आम दलितों की हितैषी होतीं तो आरक्षित वर्ग के लाखों रिक्त पदों पर भर्ती का दबाव बनातीं। भाजपा सत्ता में आई तो रिक्त पद भरे जाएंगे।

बसपा नेता सवर्णों को यह समझा नहीं सके कि दलितों को नौकरी के लिए आरक्षण देने के बाद प्रमोशन में भी आरक्षण क्यों जरूरी है?

सपा ने भी बसपा की इस कमजोर नस का खूब फायदा उठाया और पूरे चुनाव सवर्णों को इसकी याद दिलाते रहे। देखने वाली बात होगी इस फैक्टर की क्या भूमिका रही?

दंगे पर चुप ही रहीं मायावती

मुजफ्फरनगर दंगे के समय पार्टी का कोई वरिष्ठ जिम्मेदार नेता महीनों तक वहां नहीं गया। चुनाव के पहले जब बसपा अध्यक्ष मायावती लखनऊ आईं तब उन्होंने वरिष्ठ नेताओं का प्रतिनिधिमंडल वहां भेजा।

इस बीच पार्टी के नेता केवल बयानबाजी तक सीमित रहे। मुसलमानों में संदेश गया कि मुश्किल की घड़ी में बसपा उनके साथ खड़ी नहीं हुई।

इसके अलावा मायावती ने जिस तरह ब्राह्मणों को जोड़ने के लिए खुद लखनऊ में ब्राह्मण समाज का एक प्रदेश स्तरीय पदाधिकारी सम्मेलन व 36 सीटों पर सम्मेलन के बाद एक बड़ी रैली की, मुसलमानों को जोड़ने के लिए इस तरह कोई पहल नहीं हुई।

बसपा से मुसलमानों को जोड़ने की जिम्मेदारी पूरी तरह से राष्ट्रीय महासचिव नसीमुददीन सिददीकी पर केंद्रित रही।
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मुलायम करते रहे कोशिश

दूसरी ओर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री तमाम नाराजगी के बावजूद मुसलमानों को साधने के लिए विभिन्न स्तर पर स्वयं कोशिश करते नजर आए। सोशल इंजीनियरिंग को मुसलमानों ने कितनी तवज्जो दी, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

वैसे इस बात की चर्चा आम है कि नरेंद्र मोदी विरोध में लामबंद मुसलमानों ने जहां भाजपा को हराने की क्षमता में बसपा को देखा जरूर समर्थन किया, लेकिन बसपा को गद्दी दिलाने के लिहाज से वह 2007 के विधानसभा चुनाव की तरह उसके पक्ष में ध्रुवीकृत नहीं हुआ।

ऐसे दिए टिकट
ब्राह्मण - 21
मुस्लिम - 19

क्षत्रिय-08
अनुसूचित जाति (सुरक्षित)- 17
अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी)- 15
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