12 मई। चुनावी कुंभ का अंतिम पड़ाव। भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के कद पर मुहर इसी चरण में लगनी है तो मोदी और वोटों का धुव्रीकरण थामने आजमगढ़ पहुंचे सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के ख्वाब भी इसी तारीख को ईवीएम में कैद हो जाएंगे।
दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की अप्रत्याशित सफलता का मोदी के सामने वाराणसी में इम्तिहान भी इसी दौर में होना है।
वहीं, ऐन चुनाव से पहले कमल खिलाने के लिए ‘पंजा’ छोड़ चुके जगदंबिका पाल खुद अपनी सीट बचा पाएंगे, इसका फैसला भी वोटर इसी चरण में करेंगे।
दिलचस्प बात यह है कि मोदी, मुलायम और केजरीवाल तीनों को ही उनके समर्थक अगले पीएम के रूप में देखना चाहते हैं। हालांकि, फैसला इस दिन वोटिंग के बाद ही हो जाएगा।
गोरखपुर पर फहरेगा भगवा?
योगी आदित्यनाथ (भाजपा)
1998 में पहली बार भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे और सपा प्रत्याशी जमुना निषाद को शिकस्त दी। 1999 और 2004 में भी उन्होंने जमुना को शिकस्त दी।
2009 में बसपा प्रत्याश बाहुबली हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी को पटकनी दी। पांचवीं बार भाजपा के टिकट पर मैदान में।
रामभुआल निषाद (बसपा)
वर्ष 2002 में कौड़ीराम विधानसभा क्षेत्र से बसपा के टिकट पर चुनाव जीते। बसपा सरकार में मंत्री बने। हाईकोर्ट के आदेश पर चुनाव रद्द हो गया तो पाला बदलकर उपचुनाव में सपा के टिकट पर लड़े और जीते।
राजमति निषाद (सपा)
पति जमुना निषाद की सड़क हादसे में मौत के बाद 2011 में पिपराइच विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में जीतीं। पिछले विधानसभा चुनाव में फिर यहीं से जीतीं।
अष्टभुजा प्रसाद त्रिपाठी (कांग्रेस)
1982 में पाली के ब्लॉक प्रमुख बने और २००१ तक तीन बार यह दायित्व संभाला। 1984 में जनता पार्टी से तो 1996 में निर्दलीय सहजनवां से विधानसभा चुनाव लडे, हारे। गोरखपुर सदर से पहली बार लोकसभा चुनाव मैदान में हैं।
प्रो. राधे मोहन मिश्र (आप)
2002 तक गोरखपुर विश्वविद्यालय के वीसी रहे। अन्ना आंदोलन शुरू हुआ तो उसमें शामिल हो गए। लोकसभा चुनाव की घोषणा के एक माह पहले च्आपज् की सक्रिय सदस्यता ग्रहण की।
बांसगांव में अब किसका होगा बसेरा?
कमलेश पासवान (भाजपा)
राजनीति विरासत में मिली है। पिता ओम प्रकाश पासवान मानीराम से विधायक थे। सपा सरकार में अच्छी पकड़ रखने वाले ओमप्रकाश को 1996 में प्रत्याशी बनाया था। प्रचार के दौरान ही उनकी हत्या होने के बाद मां सुभावती पासवान चुनाव लड़ीं और सांसद बनीं। कमलेश पाला बदलकर योगी के साथ आ गए और 2009 में भाजपा से बांसगांव से सांसद चुने गए।
डॉ.संजय (कांग्रेस)
केजीएमसी, लखनऊ से एमडी मेडिसिन करने वाले डॉ. संजय का बड़हलगंज में नर्सिंग होम है। एसजीपीजीआई और पीजीआई चंडीगढ़ में काम कर चुके हैं। 2010 से कांग्रेस के साथ जुड़े हैं। पार्टी के श्रम प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं।
गोरख पासवान (सपा)
पहला सियासी अनुभव। इसके पूर्व सरकारी सेवा में थे। केंद्र सरकार में औद्योगिक सलाहकार भी रहे। सात साल सेवा रहते हुए वीआरएस लेकर सपा में शामिल हो गए।
सदल प्रसाद (बसपा)
2002 में बांसगांव से बसपा के टिकट पर पहली बार विधायक बने। 2004 में बांसगांव से लोकसभा के मैदान में उतरे लेकिन हार गए। 2007 में बांसगांव से फिर विधायक बने और राज्यमंत्री बनाया गया।
रामनिवास पासवान (आप)
देवरिया जिले के बरहज स्थित बाबा राघवदास महाविद्यालय में छात्र राजनीति की। 2000 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी से जुड़ गए। 2012 में अन्ना आंदोलन में शामिल हुए। च्आपज् के गठन के बाद पार्टी में शामिल हो गए।
महराजगंज का कौन होगा महाराजा?
हर्षवर्धन (कांग्रेस)
मौजूदा सांसद। 1985 से 1899 तक फरेंदा विधानसभा से जनता दल से विधायक रह चुके हैं। 1989 में जिला बनने के बाद हुए लोकसभा चुनाव में पहली बार वे जनता दल के टिकट पर सांसद बने। 1991 में जनता दल, 1996 में बसपा और 1998 में फिर जनता दल और 2004 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े लेकिन हारे।
पंकज चौधरी (भाजपा)
सातवीं बार भाजपा ने टिकट दिया है। 1991, 1996, 1998 व 2004 में भाजपा के टिकट पर सांसद रह चुके हैं। बडे़ भाई प्रदीप चौधरी और मां उज्ज्वला चौधरी जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं।
अखिलेश सिंह (सपा)
1998 के लोकसभा चुनाव में सपा से चुनाव लड़े लेकिन हारे। 1999 में भाजपा प्रत्याशी पंकज चौधरी को हराकर संसद पहुंचे। 2004 के चुनाव में फिर हार का मुंह देखना पड़ा। भाई कुंवर कौशल सिंह उर्फ मुन्ना सिंह नौतनवां से कांग्रेस के विधायक हैं।
काशीनाथ शुक्ल (बसपा)
नौकरी से त्यागपत्र देकर रियल एस्टेट के कारोबार में आए। सियासत का पहले से अनुभव नहीं। पहली बार बसपा ने उन्हें यहां से टिकट दिया है।
पशुपति नाथ गुप्त (आप)
व्यापारी नेता हैं। वर्ष 2004 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लोकसभा चुनाव मैदान में कूदे मगर करीब पांच हजार मतों पर ही सिमट गए थे।
डुमरियागंज में कौन बजाएगा डमरू?
वसुंधरा कुमारी (कांग्रेस)
बांसी राजघराने की बहू एवं क्षेत्रीय भाजपा विधायक जयप्रताप सिंह की पत्नी। जयप्रताप सिंह छह बार बांसी विधानसभा से विधायक चुने गए। दो बार निर्दल जीते। वर्तमान में भाजपा से विधायक। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर रनरअप रहे।
जगदंबिका पाल (भाजपा)
कांग्रेस के टिकट पर संसद पहुंचे और चुनाव के ऐन मौके पर भाजपा का दामन थामा। इससे पहले 2004 में इस सीट से चुनाव लड़े और रनरअप रहे थे। 1984 में कांग्रेस सेवा दल के प्रदेश अध्यक्ष और 2003 में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। 1998 में कल्याण सिंह की सरकार के अल्पमत में आने के बाद एक दिन के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
माता प्रसाद पांडेय (सपा)
मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष। इटवा सीट से विधायक हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में पांचवें स्थान पर रहे। अब तक छह बार इटवा से विधायक चुने जा चुके हैं। सपा के सबसे मजबूत सवर्ण चेहरे के तौर पर माता प्रसाद पांडेय की पहचान है। विधानसभा अध्यक्ष के तौर पर यह उनका दूसरा कार्यकाल है। इससे पहले वह प्रदेश सरकार में दो बार मंत्री भी रहे हैं।
मोहम्मद मुकीम (बसपा)
2009 लोकसभा चुनाव में तीसरे पायदान पर रहे। 2004 में बसपा के टिकट पर सांसद बने थे। 1991 और 96 में इटवा से विधायक रह चुके हैं। 2012 में कांग्रेस के टिकट पर इटवा में फिर ताल ठोका लेकिन हार गए।
बदरे आलम (आप)
1984 में इटवा विधानसभा क्षेत्र से जगजीवन राम की कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़े। 1989 में जनता दल में शामिल हुए। 1990 में जनता दल युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री हुए। 1991 में जनता दल युवा मोर्चा में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। 2004 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने पहले टिकट दिया फिर काटा।
डॉ. मोहम्मद अयूब (पीस पार्टी)
पीस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। 2012 में संतकबीरनगर की खलीलाबाद विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। डुमरियागंज विधानसभा सीट पर इनके प्रत्याशी मलिक कमाल यूसुफ को 2012 में जीत मिली थी, लेकिन विधानसभा में कुछ साथी विधायकों के साथ बगावत करके वह सपा को समर्थन दे रहे हैं।
कुशीनगर से किसे मिलेगी खुशी?
आरपीएन सिंह (कांग्रेस)
सियासत विरासत में मिली। पिता स्व. सीपीएन सिंह केंद्र में रक्षा राज्य मंत्री रहे। आरपीएन सिंह 1997 से 2007 तक पडरौना से तीन बार विधायक बने। 2004 के लोकसभा चुनाव में हारे। 2009 के लोस चुनाव में बसपा के प्रत्याशी स्वामी प्रसाद मौर्य को हराकर पहली बार सांसद बने। इस समय केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हैं।
राजेश पांडेय उर्फ गुड्डू (भाजपा)
राजेश पांडेय उर्फ गुड्डू के पिता राजमंगल पांडेय कसया से विधायक और देवरिया से सांसद रहे। चंद्रशेखर सिंह के प्रधानमंत्रित्वकाल में वे मानव संसाधन विकास मंत्री थे। 1992 में पिता के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत संभाली। दो बार भाजपा से एमएलसी रह चुके हैं। वर्ष 2007 में कांग्रेस से कसया और 2009 में भाजपा प्रत्याशी के रूप में पडरौना विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाई लेकिन दोनों बार हारे।
राधेश्याम सिंह (सपा)
हाटा से विधायक हैं। 1996 में पहली बार निर्दल प्रत्याशी के रूप में रामकोला विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। दूसरी बार इसी विधानसभा क्षेत्र से सपा प्रत्याशी के रूप में विधायक चुने गए लेकिन तीसरी बार हार गए। 2012 में रामकोला सीट सुरक्षित हो गई तो हाटा पहुंचे।
डॉ. संगम मिश्र (बसपा)
नीदरलैंड से पीएचडी की उपाधि ग्रहण की है। कुशीनगर लोकसभा सीट पर अब तक बसपा ने जीत का स्वाद नहीं चखा है। इसलिए इस बार डॉ. संगम मिश्र को बसपा ने उम्मीदवार बनाया है।
अखंड प्रताप सिंह (आप)
चीनी मिल के मजदूर नेता रहे हैं। वर्ष 2012 में खड्डा से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। लक्ष्मीगंज की बंद चीनी मिल को चलवाने के लिए वहां से दिल्ली तक की पदयात्रा की थी। अपने प्रयास से एक बार लक्ष्मीगंज चीनी मिल को चलवा भी चुके हैं।
सलेमपुर किसे करेगा सलाम?
रविंद्र कुशवाहा (भाजपा)
1982 में जनता युवा मोर्चा के बैनर तले छात्र राजनीति से सियासी सफर शुरू किया। 1984 से 2004 तक पिता पूर्व सांसद स्व. हरिकेवल प्रसाद के प्रतिनिधि रहे। पिता के मृत्यु के बाद सपा से टिकट नहीं मिलने पर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही के नेतृत्व में भाजपा में शामिल हो गए। रविन्द्र का यह पहला चुनाव है।
हरिवंश सहाय (सपा)
1969 में सोशलिस्ट पार्टी से भाटपाररानी विधानसभा से विधायक चुने गए। इसके बाद 1989 व 1991 में भी जनता दल से विधायक चुने गए और प्रदेश उपाध्यक्ष भी रहे। 1996 में सपा से इस सीट सांसद चुने गए। 1998 व 1999 में भी लड़े लेकिन हारे। 2009 में लोकसभा का टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर बसपा में शामिल हो गए थे।
रविशंकर सिंह पप्पू (बसपा)
बलिया जिले से विधानपरिषद सदस्य हैं। पहली बार 2009 में जनता दल यूनाइटेड से सलेमपुर संसदीय सीट पर चुनाव लड़े लेकिन हार गए। इसके बाद बसपा में चले गए।
डॉ. भोला पांडेय (कांग्रेस)
1972 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी से छात्र राजनीति से सियासी सफर की शुरुआत। 1975 में कांग्रेस में शामिल हुए और 1980 से बलिया जिले के दोआबा विधानसभा से दो बार विधायक रहे। पांच बार से लगातार सलेमपुर संसदीय का चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन जीत नसीब नहीं हुई।
चंद्र प्रताप सिंह (आप)
आम आदमी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर सियासी सफर की शुरूआत की। इसके पहले प्राइवेट कंपनी में एजीएम पद पर कार्यरत थे।
मिर्जापुर का कौन बनेगा मिर्जा?
सुरेंद्र पटेल (सपा)
वाराणसी की सेवापुरी सीट से विधायक पटेल प्रदेश सरकार में लोक निर्माण राज्यमंत्री। पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। जनपद में कुर्मी बिरादरी की बहुलता व अन्य पिछड़ी जातियों के वोट बैंक में सेंध लगाने की गणित से पार्टी ने मैदान में उतारा।
ललितेशपति त्रिपाठी (कांग्रेस)
दिग्गज कांग्रेस नेता स्व. पंडित कमलापति त्रिपाठी के प्रपौत्र। जिले की मड़िहान सीट से विधायक हैं। पहली बार लोस का चुनाव लड़ रहे हैं।
अनुप्रिया पटेल (अपना दल+भाजपा)
अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की पुत्री। वाराणसी की रोहनिया सीट से विधायक। पहली बार लोस का चुनाव लड़ रही हैं। भाजपा ने कुर्मी मतों के लिए यह और प्रतापगढ़ की सीट देकर गठबंधन किया है।
समुद्रा बिंद (बसपा)
जनपद के मझवां क्षेत्र से बसपा विधायक डॉ. रमेशचंद्र बिंद की पत्नी। पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं। जनपद में दलित वोट बैंक के साथ ही बिंद बिरादरी के बड़ी संख्या को देखते हुए बसपा ने इन्हें मैदान में उतारा है।
आजमगढ़ में बदलेगा आजम?
मुलायम सिंह यादव (सपा)
पार्टी के मुखिया उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं। मूल रूप से इटावा जिले के सैफई गांव के रहने वाले हैं। थर्ड फ्रंट के जरिये प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं और मैनपुरी से भी चुनाव मैदान में हैं।
शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली (बसपा)
जिले के मुबारकपुर क्षेत्र से विधायक हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा के टिकट से विधायक चुने गए। पेशे से कारोबारी हैं। लोकसभा चुनाव मैदान में पहली बार उतरे हैं।
रमाकांत यादव (भाजपा)
दो बार सपा, एक बार बसपा तथा 2009 में भाजपा के टिकट से सांसद चुने गए। मूलरूप से लालगंज लोकसभा क्षेत्र के सरांवा गांव के निवासी हैं।
अरविंद जायसवाल (कांग्रेस)
अजमगढ़ नगर पंचायत के चेयरमैन रह चुके जायसवाल 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर सगड़ी क्षेत्र से भाग्य आजमा चुके हैं। कांग्रेस के जिलाध्यक्ष भी हैं। पत्नी नीतू जायसवाल अजमतगढ़ नगर पंचायत की चेयरमैन हैं।
राजेश यादव (आप)
पेशे से अधिवक्ता राजेश यादव नगर क्षेत्र के निवासी हैं। आम आदमी पार्टी का गठन होने के पहले से अरविंद केजरीवाल के आंदोलनों में साथ रहे। इस चुनाव के जरिये सियासी कॅरिअर की शुरुआत कर रहे हैं।
लालगंज किसे बनाएगा अपना लाल
नीलम सोनकर (भाजपा)
2009 में लालगंज लोकसभा सीट से पहली बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ीं। काफी कम मतों के अंतर से चुनाव हारने के बाद दोबारा गणना की अदालत में अपील की। मामला अभी लंबित है और फिर से चुनाव मैदान में हैं।
डॉ. बलिराम (बसपा)
लालगंज सीट से 1996, 1999 और 2009 में सांसद रह चुके हैं। फिर इसी सीट से चुनाव मैदान में हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से डाक्ट्रेट की डिग्री हासिल करने वाले बलिराम बामसेफ से जुड़ गए।
बलिहारी बाबू (कांग्रेस)
बसपा से दो बार राज्यसभा सदस्य रहे। लेकिन २००९ में पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने के आरोप में पार्टी से निष्कासित होने के बाद कांग्रेस में पहुंचे। लालगंज सुरक्षित सीट से पहली बार चुनाव मैदान में हैं।
बेचई सरोज (सपा)
सपा से मौजूदा विधायक। पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनैतिक नहीं है। लोकसभा का पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं।
डॉ. जियालाल (आप)
समुद्र विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक पद से सेवानिवृत्त। अंटार्कटिका अभियान दल के सदस्य भी रहे। केजरीवाल के आंदोलन से प्रभावित होकर आम आदमी पार्टी से जुड़े।
देवरिया का कौन होगा देव?
सभा कुंवर कुशवाहा (कांग्रेस)
शिक्षक रहे कुशवाहा 1996 में इस्तीफा देकर भाटपाररानी विधानसभा से पहला चुनाव निर्दल के रूप में लड़े। 2002 में समता पार्टी, 2007 और 2012 में बसपा से चुनाव लड़े लेकिन चारों चुनाव में हारे। पिछले वर्ष भाटपाररानी विधानसभा के उप चुनाव में बसपा ने टिकट नहीं दिया तो निर्दलीय भाग्य आजमाया।
कलराज मिश्र (भाजपा)
मौजूदा समय लखनऊ पूरब से विधायक मिश्र 1978 में पहली बार राज्यसभा पहुंचे।1986, 92 और 98 में विधान परिषद के सदस्य चुने गए। 2001 और 2006 में राज्यसभा सदस्य चुने गए। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के साथ ही सूबे में मंत्री भी रहे।
बालेश्वर यादव (सपा)
1980 में भारतीय क्रांति दल से विधानसभा का चुनाव लड़े लेकिन हारे। 1984 में लोकदल से विधायक तो 89 में पड़रौना से जद से सांसद बने। 93 में सपा से विधायक बने। 2004 में पड़रौना से निर्दल सांसद बने तो 2009 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े।
नियाज अहमद खां (बसपा)
बसपा से राजनैतिक सफर शुरू किया। वर्ष 2010 में कांग्रेस से एमएलसी का चुनाव लड़े और हारे। 2012 में पथरदेवा विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस का टिकट कटने पर निर्दलीय चुनाव लड़े, हारे।
अरुण कुमार त्रिपाठी (आप)
अगस्त 1985 में न्यायिक सेवा में आए। देवरिया में स्पेशल जज एससी-एसटी और परिवार न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के पद से वीआरएस लेकर चुनाव मैदान में उतरे हैं।
बलिया की बदल पाएगी फिजा?
नीरज शेखर (सपा)
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर के छोटे पुत्र हैं। लोकसभा चुनाव मैदान में तीसरी बार उतरे हैं। पिछले दो चुनावों में भी सपा से ही चुनाव लड़े और जीते। इस सीट से चंद्रशेखर आठ बार चुनाव जीते थे।
भरत सिंह (भाजपा)
बलिया के दोआबा विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक रहे। 1991 में पहली बार भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते। दूसरी बार 1996 में जीते। 2002 में सूबे के मंत्री भी बनाए गए। पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।
वीरेंद्र कुमार पाठक (बसपा)
बांसडीह विधानसभा क्षेत्र से छह बार विधायक और मंत्री रह चुके बच्चा पाठक के भतीजे हैं। पेशे से इंजीनियर हैं। पहली बार लोकसभा चुनाव के मैदान में उतरे हैं।
सुधा राय (कांग्रेस)
पूर्व मंत्री कल्पनाथ राय की पत्नी हैं। पहली बार बलिया लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रही हैं। इसके पहले वह तीन बार घोसी लोकसभा सीट और एक बार नत्थूपुर (वर्तमान में मधुबन विस क्षेत्र) से चुनाव लड़ चुकी हैं।
अफजाल अंसारी (कौमी एकता दल)
बाहुबली मुख्तार अंसारी के बड़े भाई हैंss। गाजीपुर क्षेत्र से एक बार सांसद और मुहम्मदाबाद क्षेत्र से पांच बार विधायक रह चुके हैं। लोकसभा चुनाव तीसरी बार लड़ रहे हैं।
कर्नल भरत सिंह (आप)
दूसरी बार बलिया लोस सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इसके पहले बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं।
गाजीपुर में कौन जीतेगा बाजी?
शिवकन्या कुशवाहा (सपा)
एनआरएचएम घोटाले के आरोपी और बसपा के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी। पति के सलाखों के पीछे जाने के बाद सपा के टिकट पर पहली बार लोस चुनाव लड़ रही हैं। पार्टी ने सिटिंग सांसद राधेमोहन सिंह का टिकट काटकर प्रत्याशी बनाया।
ईश्वरी प्रसाद कुशवाहा (भाकपा माले)
भाकपा माले केंद्रीय कमेटी के सदस्य तथा अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय सचिव हैं। 2004 तथा 2009 में भी लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन दोनों बार हार का मुंह देखना पड़ा। अबकी तीसरी बार चुनाव मैदान में हैं।
मनोज सिन्हा (भाजपा)
गाजीपुर सीट से दो बार सांसद रह चुके हैं। सबसे पहले १९९६ में भाजपा टिकट पर चुनाव लड़े और जीते थे। १९९९ में भी भाजपा से सांसद चुने गए।
कैलाशनाथ सिंह यादव (बसपा)
२००२ में सैदपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक तथा २००४ में चंदौली लोकसभा क्षेत्र से सांसद बने। बसपा सरकार में परती भूमि विकास एवं जल संसाधन मंत्री बनाया गया। पहली बार गाजीपुर लोकसभा सीट के लिए बसपा से चुनाव लड़ रहे हैं।
मो. मकसूद खां (कांग्रेस)
यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव। बिहार एवं जम्मू के प्रदेश प्रभारी भी हैं। पहली बार गाजीपुर लोकसभा सीट से पार्टी ने मैदान में उतारा है।
ब्रज भूषण दुबे (आप)
फिलहाल जिला पंचायत सदस्य हैं। २०१२ में निर्दल प्रत्याशी के रूप में सदर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े थे लेकिन हारे। पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।
डीपी यादव (एकता मंच)
बाहुबली। गांव की प्रधानी से राजनीतिक सफर शुरू कर ब्लॉक प्रमुख, विधायक, राज्यसभा सदस्य और सांसद रह चुके हैं। संभल सीट से अपनी पार्टी राष्ट्रीय परिवर्तन दल और एकता मंच के सहयोग से तो यहां से एकता मंच के प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं।
घोसी में होगी अनुभव की परीक्षा
हरिनरायन राजभर (भाजपा)
प्रदेश सरकार में १९९७ से २००२ तक मंत्री रहे। १९७७ में जनता पार्टी से राजनीतिक सफर की शुरुआत। १९९१ में पहली बार भाजपा से विधायक। १९९६ में भी फिर भाजपा से विधायक चुने गए। लोकसभा का चुनाव पहली बार लड़ रहे हैं।
दारा सिंह चौहान (बसपा)
बसपा के सिटिंग सांसद हैं। १९९६ में बसपा से राज्यसभा सदस्य रहे। १९९९ में बसपा छोड़ सपा का दामन थामा। २००० में सपा से राज्यसभा सदस्य बने। २००६ में सपा छोड़ फिर बसपा में शामिल।
राष्ट्र कुंवर सिंह (कांग्रेस)
१९९१ में युवक कांग्रेस से राजनीति की शुरुआत। स्व. कल्पनाथ राय के अनुयायी। कांग्रेस जिला अध्यक्ष रहे। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव भी थे। पहली बार लोकसभा के लिए उम्मीदवार।
राजीव राय (सपा)
२००५ में समाजवादी पार्टी से जुड़े। कर्नाटक के प्रभारी रहे। २०१२ में पार्टी प्रवक्ता के रूप में काम किया। पार्टी के मीडिया प्रभारी भी रहे। २०१४ में पहली बार सपा के टिकट पर लोकसभा उम्मीदवार।
अतुल कुमार अंजान (भाकपा)
राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से। लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे। १९८१ में भाकपा की केंद्रीय कमेटी के सदस्य बने। फिर राष्ट्रीय सचिव। पिछले चार चुनाव से लगातार घोसी लोकसभा सीट से भाकपा उम्मीदवार के रूप में लड़ रहे हैं।
मनीष कुमार राय (आप)
सर्वोदय इंटर कॉलेज, घोसी में प्रवक्ता। आम आदमी पार्टी की स्थापना के समय ही पार्टी से जुड़े। पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।
जौनपुर में है कड़ा मुकाबला
पारसनाथ यादव (सपा)
प्रदेश की अखिलेश सरकार में मंत्री। इससे पहले भी मंत्री रहे हैं। ग्राम पंचायत से सियासी सफर की शुरुआत की और अब तक दो बार सांसद और पांच बार विधायक चुने गए।
केपी सिंह (भाजपा)
प्रदेश की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे उमानाथ सिंह के पुत्र। जिले के सिरकोनी ब्लॉक के महरूपुर निवासी केपी सिंह इंजीनियरिंग कॉलेज चलाते हैं। पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।
सुभाष पांडेय (बसपा)
२००७ में पहली बार बसपा के टिकट पर मछलीशहर सीट से चुनकर विधानसभा पहुंचे। प्रदेश में बसपा की सरकार बनी तो कैबिनेट मंत्री बने। २०१२ के विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं पा सके।
डॉ. केपी यादव (आप)
लंबे समय से सपा में सक्रिय। पिछली बार सपा सरकार में गो सेवा आयोग के चेयरमैन बने। सपा से टिकट कटने पर आम आदमी पार्टी का दामन थामा। लोकसभा चुनाव पहली बार लड़ रहे हैं।
रवि किशन (कांग्रेस)
भोजपुरी फिल्म अभिनेता हैं। कई हिंदी फिल्मों में भी काम कर चुके हैं। जिले के केराकत तहसील के बराई बिशुई गांव के रहने वाले हैं। पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं।
धनंजय सिंह (निर्दल)
२००९ में पहली बार बसपा के टिकट पर सांसद चुने गए। राजनीतिक पारी की शुरुआत २००२ में की और रारी से निर्दल विधायक चुने गए। २००४ में कांग्रेस के समर्थन से लोस का चुनाव लड़े लेकिन हारे। २००७ में रारी से दोबारा विधायक चुने गए।
वाराणसी में सबसे बड़ा मुकाबला
नरेंद्र मोदी (भाजपा)
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार। बारह साल से गुजरात के मुख्यमंत्री। लगातार दो बार मणिनगर सीट से विधायक। टाइम पत्रिका २०१४ की टॉप १०० शख्सियतों की सूची में शामिल।
अरविंद केजरीवाल (आप)
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री। आईआईटी से इंजीनियरिंग पास केजरीवाल आईआरएस अफसर भी रह चुके हैं। मैगसायसाय पुरस्कार विजेता। टाइम पत्रिका २०१४ की टॉप १०० शख्सियतों की सूची में शामिल।
अजय राय (कांग्रेस)
लगातार पांच बार से विधायक हैं। उन्होंने भाजपा के टिकट पर १९९६ में भाकपा के दिग्गज नेता और नौ बार विधायक रहे ऊदल को पराजित कर कोलअसला सीट छीनी थी। इसके बाद इस सीट पर लगातार चार बार काबिज रहे, तीन बार भाजपा के टिकट पर जबकि चौथी बार निर्दल। पांचवीं बार कांग्रेस के टिकट पर पिंडरा से चुने गए। लोस चुनाव पहली बार लड़ रहे हैं।
कैलाश चौरसिया (सपा)
प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार में बेसिक शिक्षा एवं बाल विकास पुष्टाहार राज्यमंत्री हैं। मूलत: मिर्जापुर के निवासी हैं और वहां से तीन बार से विधायक चुने जाते रहे हैं। पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं।
विजय प्रकाश जायसवाल (बसपा)
वर्ष २०१२ में अपना दल से विधानसभा चुनाव लड़े थे। बाद में पार्टी छोड़कर बसपा में शामिल हो गए। पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।
राबर्ट्सगंज (सोनभद्र) का कौन होगा किंग
पकौड़ी लाल कोल (सपा)
मौजूदा सांसद। चुनाव की घोषणा से काफी पहले से प्रचार में लगे हैं। २००४ और २००७ के चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे थे। क्षेत्र में वनवासियों की बहुलता और जनहित के मुद्दों पर आवाज उठाने को अपनी जीत का मंत्र मान रहे हैं।
भगवती प्रसाद (कांग्रेस)
मूल रूप से मिर्जापुर निवासी भगवती विधायक और जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके हैं। पहली बार राबर्ट्सगंज सीट से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं।
रविशंकर कन्नौजिया (आप)
क्षेत्र से सांसद रह चुके शिवसंपत राम के भतीजे हैं। दुद्धी थाना क्षेत्र के महुली के रहने वाले हैं। यह गांव आदिवासी क्षेत्र में वर्षों से उच्च शिक्षा के मामले में मिसाल बना हुआ है।
छोटेलाल खरवार (भाजपा)
भाजपा अनुसूचित जाति-जनजाति मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के गृहक्षेत्र के रहने वाले हैं। चंदौली जिले के चकिया के गांव नेवढ़िया के तीन बार प्रधान रह चुके हैं। मशहूर बिरहा गायक हैं।
शारदा प्रसाद (बसपा)
प्रदेश की पिछली बसपा सरकार में राज्यमंत्री रहे। स्मारक घोटाले में भी नाम है। पार्टी संगठन में अच्छी पकड़। काफी पहले से चुनाव प्रचार में लगे हैं।
एसआर दारापुरी (आईपीएफ)
ईमानदार आईपीएस अफसर के रूप में मशहूर। तैनाती के दौरान ईमानदारी से किए गए कार्यों पर भरोसा है। वह आमिर खान के च्सत्यमेव जयतेज् शो में भी प्रतिभाग कर चुके हैं। इनका मानना है कि आईपीएफ यहां समाज के दबे-कुचले के लिए लंबे समय से संघर्ष करती आई है। खासकर असंगठित मजदूरों का मुद्दा उनके लिए काफी मददगार होगा।
मछलीशहर, सपा को चौथी बार भी उम्मीद
तूफानी सरोज (सपा)
तीन बार से लगातार सांसद हैं। दो बार सैदपुर संसदीय क्षेत्र से और वर्तमान में मछलीशहर से सांसद हैं। पांचवीं बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।
बीपी सरोज (बसपा)
२००८ से पहले महाराष्ट्र की राजनीति में सक्रिय रहे। वहां बसपा के प्रदेश सचिव भी रहे। इसके बाद जौनपुर की राजनीति में सक्रिय हो गए। पहली बार बसपा के टिकट पर मछलीशहर (सुरक्षित) संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं।
रामचरित्र निषाद (भाजपा)
दूसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में अपना दल के टिकट से इसी क्षेत्र से चुनाव लड़े थे। अबकी बार इन्हें भाजपा ने प्रत्याशी बनाया है। २००७ में बस्ती जिले की मेंहदावल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ चुके हैं।
वीरेंद्र सोनकर (आप)
पहली बार आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। इससे पहले वह किसी भी राजनीतिक दल में नहीं थे। एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद अन्ना आंदोलन में शामिल हुए। बाद में अरविंद केजरीवाल ने पार्टी बनाई तो उनके साथ आ गए।
तूफानी निषाद (कांग्रेस)
दिल्ली के वजीराबाद इलाके के निवासी हैं। जिले में इसके पहले कभी राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं रहे। पहली बार यहां से चुनाव लड़ रहे हैं।
चंदौली, जातीय समीकरण हावी
रामकिशुन यादव (सपा)
मौजूदा सांसद। दो बार विधायक भी रह चुके हैं। पार्टी ने जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश में फिर मैदान में उतारा है।
महेंद्र नाथ पांडेय (भाजपा)
यूपी की कल्याण सरकार में मंत्री रह चुके हैं। गाजीपुर के सैदपुर से दो बार विधायक चुने गए थे। पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं।
अनिल मौर्या (बसपा)
वाराणसी के चिरईगांव विधानसभा से विधायक रह चुके हैं। वह पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं।
तरुण पटेल (कांग्रेस)
मूल रूप से गोंडा जिले के निवासी युवा नेता हैं। वह पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं।
इरशाद उर्फ इरशादुद्दीन (आप)
मुगलसराय के निवासी हैं। पहली बार लोकसभा चुनाव में उतरे हैं।