केदारनाथ में जो हुआ, बेहद भयावह था। इसका कारण प्राकृतिक होने के साथ ही मानव द्वारा बिना सोचे- समझे किया जा रहा विकास भी है।
भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए जरूरी है कि विकास में विज्ञान का सहयोग लिया जाए।
केदारनाथ त्रासदी पर ये बातें वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी देहरादून के निदेशक डॉ. अनिल कुमार गुप्ता ने कहीं। वे शनिवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में आयोजित सेमिनार को संबोधित कर रहे थे।
सेमिनार मे हिमालय और जलवायु परिवर्तन पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने भाग लिया। डॉ. गुप्ता के अनुसार उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अब नदी के दोनों तरफ 200 मीटर तक किसी भी तरह का निर्माण करने पर रोक लगा दी है।
रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर के वैज्ञानिक डॉ. एके टांगड़ी ने कहा कि सड़क बनाने में किए जा रहे अंधाधुंध धमाके और बगैर योजना के हो रहे निर्माण कार्यों से हिमालय की मृदा का संतुलन बिगड़ गया है।
प्राकृतिक प्रकोपों से बचने के लिए जरूरी है कि हम हिमालय की रक्षा करें। लविवि के भूगर्भ विज्ञान के शिक्षक डॉ. ध्रुवसेन सिंह के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं को नियंत्रित करना मनुष्य के बस में नहीं है पर सावधानी बरतकर हम प्राकृतिक आपदाओं के प्रकोप कम जरूर कर सकते हैं।
सेमिनार में सीएसआईआर के डीके उप्रेती और तारिक हुसैन और लविवि के बॉटनी विभाग के अध्यक्ष प्रो. वाईके शर्मा भी मौजूद थे।