बसपा सुप्रीमो मायावती और राज्यसभा सदस्य अखिलेश दास भले ही टिकटों में लेन-देन का अब खुलासा कर रहे हों, लेकिन थोड़ी भी जागरूकता रखने वाले लोग इससे पहले से वाकिफ हैं।
यह स्थिति राज्यसभा जैसे उच्च सदन की उम्मीदवारी के दौरान ही सामने नहीं आ रही, विधानसभा, विधान परिषद, पंचायत और निकाय चुनावों तक में टिकट देने के बदले पैसा लिए जाने के आरोप लगते रहे हैं। राजनीति में शुचिता की लड़ाई लड़ने वाले लोग मानते हैं कि जब से राजनीति में उद्योगपतियों और अपराधियों की एंट्री हुई है, खरीद-फरोख्त का चलन बढ़ गया है।
मायावती ने मंगलवार को खुलासा किया था कि अखिलेश दास ने राज्यसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाने के लिए उन्हें सौ करोड़ रुपये की पेशकश की थी। इसके जवाब में अखिलेश दास ने कहा कि उन्होंने टिकट के बदले धन की पेशकश नहीं की थी लेकिन मायावती टिकट के लिए पैसे लेती हैं।
दोनों नेताओं के बयान भले ही एक दिन आए हों, लेकिन प्रदेश और देश की राजनीति में पैसे की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। पैसे लेकर राज्यसभा चुनावों में विधायक भितरघात तक कर चुके हैं। उद्योगपति ललित सूरी भी एक बार यूपी से राज्यसभा का चुनाव लड़ने की कोशिश कर चुके हैं। विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगने पर वे चुनाव लड़े बिना लौट गए थे।
झारखंड में तो विधायकों की खरीद-फरोख्त के चलते दो साल पहले राज्यसभा चुनाव ही स्थगित हो गया था। सीबीआई जांच के बाद वहां कुछ विधायकों और उद्योगपति प्रत्याशी आरके अग्रवाल को जेल तक जाना पड़ा था। पश्चिम बंगाल, ओडिशा जैसे कई राज्यों में राज्यसभा चुनावों में वोटरों को खरीदने के मामले चर्चा में आ चुके हैं।
मायावती ने मांगा था सांसध, विधायक निधि का धन
इस पर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स-इलेक्शन वॉच के यूपी के कोऑर्डिनेटर एवं सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक आईसी द्विवेदी का कहना है कि धनबल और बाहुबल की भूमिका बढ़ने से राजनीति में गिरावट का दौर शुरू हो गया। मायावती टिकट कैसे बांटती हैं, यह सभी को पता है। काफी पहले उनका एक वीडियो क्लिप सामने आया था जिसमें वे सांसदों, विधायकों से उनकी निधि का एक फीसदी धन पार्टी फंड के लिए देने को कह रही थीं।
जहां तक अखिलेश दास का सवाल है, उनकी छवि के बारे में भी सभी लोग जानते हैं। बसपा प्रत्याशी के रूप में वे वर्ष 2009 का लोकसभा चुनाव हारे थे। उस चुनाव में मतदान के दौरान लोहिया पार्क के पास दास की तरफ से ऐसे अखबार बंटते हमने देखे थे जिसमें उनकी स्थिति बहुत अच्छी बताई जा रही थी।
बदल गए अर्थ: राज्यसभा ऐसे वरिष्ठ नेताओं, विशेषज्ञों के लिए है जो वहां पहुंचकर अपने प्रदेश के हितों का खयाल रख सकें। लेकिन राज्यसभा में बाहरी लोगों को भेजा जाने लगा। दुखद है कि राज्यसभा में जाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह असम में हितेश्वर सैकिया के किरायेदार बन गए।
बहुत समय पहले राजनीति में उद्योगपतियों ने आना शुरू किया। वे राज्यसभा जाने लगे। तब से अनैतिक तरीकों और धनबल का चलन बढ़ गया। ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के अनेक मामले सामने आ चुके हैं। इनकी जांच भी हुई है। सिस्टम की विडंबना है कि ब्यूरोक्रेट्स की सत्यनिष्ठा भी वही राजनीतिज्ञ सर्टिफाइड करते हैं, जो खुद दागदार हैं।
कौन मानेगा, दास पैसा देकर राज्यसभा नहीं गए
वहीं, सेवानिवृत्त आईएएस और लोकप्रहरी के संयोजक एसएन शुक्ला का कहना है कि मायावती और अखिलेश दास ने खुद यह खुलासा कर दिया है कि राज्यसभा में जाने के लिए बड़े पैमाने पर धन का लेन-देन होता है।
अखिलेश दास अब लाख सफाई दें लेकिन कौन मानेगा कि पिछली बार वे बिना पैसा दिए राज्यसभा गए थे। चाय ही केतली को काला बता रही है। यानी पैसा लेने-देने वाले लोग एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं।
अखिलेश दास की यह बात कौन मानेगा कि उन्होंने पिछले चुनाव में टिकट के लिए पैसे नहीं दिए थे। दास को राज्यसभा टिकट के लिए ऑफर मिला होता तो डील हो गई होती। लगता है कि दास की समझ में आ गया है कि केंद्र और राज्य में मायावती की खास भूमिका नहीं रह गई है इसलिए दूसरा ठिकाना तलाशने की कोशिश में हैं।
पैसे के लेन-देन की यह स्थिति उन राज्यसभा सीटों के लिए है जिनका चुनाव विधायक करते हैं। अब तो राज्यसभा और विधान परिषद के उन नामित सदस्यों के चयन पर भी अंगुलियां उठने लगी हैं जो साहित्य, कला, विज्ञान और दूसरे विशेषज्ञों के लिए निर्धारित हैं।
खुलकर सामने आ रही सियासत की बुराइयां: राजनीति की बुराइयां अब खुलकर सामने आ रही हैं। वातावरण बदल रहा है, लोग इन्हें बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। जब से न्यायपालिका ने सख्ती शुरू की है, धनबल और बाहुबल के खिलाफ जागरूकता बढ़ी है।
बसपा में मिशनरी कार्यकर्ताओं को तरजीह
भले ही बसपा सुप्रीमो पर टिकट देने में धनबल के आरोप लगते रहे हों लेकिन मायावती राज्यसभा के लिए मिशनरी कार्यकर्ताओं को तरजीह देती हैं। इनमें अधिकांश दलित समाज के रहते हैं। बसपा से जुड़े नेता मायावती और अखिलेश दास के बयानों पर प्रतिक्रिया से खुद को अलग रखते हैं।
बसपा सांसद रहे एक नेता बताते हैं कि राज्यसभा के लिए मायावती की पहली प्राथमिकता मिशनरी कार्यकर्ता रहते हैं। वे प्राय: दलित होते हैं। वीर सिंह और राजाराम को राज्यसभा टिकट इसी आधार पर दिया गया है। अवतार सिंह करीमपुरी, बृजलाल खाबड़ी, जुगल किशोर, अंबेद राजन जैसे लोग इसी आधार पर राज्यसभा में भेजे गए। दूसरी प्राथमिकता जातीय पकड़ रखने वाले नेताओं को मिलती है।
ऐसे नेताओं में आगरा कालेज में एसोसिएट प्रोफेसर रहे एसपी सिंह बघेल, नरेन्द्र कश्यप और राजपाल सिंह सैनी को राज्यसभा भेजा गया। नरेन्द्र कश्यप अपनी जाति के नेता के बजाय बसपा काडर के रूप में ज्यादा पहचान रखते हैं। वे दो बार एमएलसी भी रह चुके हैं। बघेल चूंकि तीन बार सपा सांसद रह चुके थे, इसलिए उन्हें बघेल, पाल, गडरिया जैसी जातियों का वोट ट्रांसफर कराने वाला नेता मानकर राज्यसभा भेजा गया।
पहली बार इस उद्योगपति को दिया मायावती ने टिकट
तीसरी श्रेणी मायावती के नजदीकी समझे जाने वाले सतीश चंद्र मिश्र, बृजेश पाठक जैसे नेताओं की है। जहां तक उद्योगपतियों को राज्यसभा भेजने का प्रश्न है, पहली बार मायावती ने जयंत मल्होत्रा को टिकट दिया था।
उस समय बसपा के केवल 35 विधायक थे और पार्टी सत्ता से दूर थी। धनबली को टिकट देने का दूसरा केस अखिलेश दास का है। वह धनबल के चलते राज्यसभा गए या वैश्य समाज के कारण, इसे लेकर बसपा नेता खुद स्पष्ट नहीं हैं।