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मिलिए सत्यजीत रे के बेटे संदीप रे से

Fri, 21 Feb 2014 11:14 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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शहर के पुराने लखनऊ में तीन दिन से तांगा और उसके पीछे-पीछे कैमरा सरपट दौड़ रहा है। यहां बांग्ला फिल्म ‘बादशाही अंगूठी’ की शूटिंग चल रही है।
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कभी चौक, चौपटिया में तो कभी कैसरबाग, अमीनाबाद, इमामबाड़ा के आसपास। सुबह से शाम तक यूनिट के लोग जुटे हुए हैं।

इन सबके साथ कभी दूर तो कभी नजदीक ही बांग्ला कलाकारों को टूटी-फूटी हिंदी में निर्देश देते दिख रहे हैं फिल्म के निर्देशक संदीप रे।

फिल्मकार सत्यजीत रे के बेटे संदीप पापा के एक उपन्यास पर आधारित इस फिल्म की शूटिंग 8 मार्च तक यहीं करेंगे। बृहस्पतिवार को शूटिंग के दौरान ‘अमर उजाला’ ने उनसे फिल्म के अलावा अन्य मुद्दों पर बातचीत की।

पुराने लखनऊ में ही शूटिंग क्यों?

पुराना लखनऊ ही लखनऊ की जान है। आज भी यहां की गलियों से गुजरिए, लखनवी अहसास भीतर तक तारी हो जाता है। फिल्म की कहानी भी यहां के बारे में बयां करती हैं।

इसीलिए यहां की हर पहचान फिल्म में दिखेगी, चाहें वो स्थान हों या यहां का बुनियादी खान-पान। इसीलिए काफी शूट मुख्य किरदार के साथ तांगे पर हो रहा है। फिर शूट के लिए इनडोर और आउटडोर लोकेशन की लंबी चेन है।

पापा के साथ लखनऊ से जुड़ी कोई पुरानी याद?

काफी यादें हैं। पापा के साथ शतरंज के खिलाड़ी की शूटिंग के समय मैंने लखनऊ को जितना करीब से देखा आज भी वही अहसास आता है।

तब मैंने अपने कैमरे से करीब एक हजार से ज्यादा चित्र खींचे थे। आज भी सुरक्षित हैं। अब इतने समय के बाद पापा का लखनऊ भले ही बदल गया है।

शहर में ओवरब्रिज दिखते हैं। नया लखनऊ तो चौंकाता है, लेकिन वे लखनवी नहीं बदले। वे अब भी उतनी ही गर्मजोशी से दिखते हैं।

पापा की कोई फिल्म दोबारा बनाने का प्लान?

नहीं, उन जैसे मास्टर क्लास की कोई भी कृति कोई दूसरा नहीं बना सकता। में तो ऐसा सोच भी नहीं सकता। न आप उन जैसा सोच सकते हैं और न ही उसे उतार सकते हैं। इससे दूर ही रहना बेहतर।

फिल्म कब तक पूरी हो जाएगी?

यहां फिल्म की शूटिंग 8 मार्च तक होनी है। उसके बाद हरिद्वार में शूटिंग होगी। अप्रैल तक शूटिंग खत्म होने के बाद पोस्ट प्रोडक्शन वर्क खत्म होते होते नवंबर-दिसंबर तक रिलीज हो सकती है फिल्म।

प्लानिंग है कि फिल्म हिंदी सब टाइटिल के साथ यहां भी रिलीज हो। आखिर यहां की लोकेशन हैं, यहां के लोग भी हैं।
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शूटिंग में कोई दिक्कत तो नहीं आई?

यहां के लोग बहुत ही सर्पोटिव है। इसका एक कारण ये भी है कि वे मुझे नहीं पहचानते और न ही मेरा क्रू भारी भरकम है। 80-90 क्रू मंबर्स कहीं भी फिट हो जाते हैं शूट होता रहता है।
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