समाजवादी पार्टी लू थमने पर पूर्वांचल को मथेगी। यहां उसे शून्य से आगे बढ़ने के लिए शुरुआत करनी होगी। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव की रणभूमि में दिग्गज नेताओं को उतारने की रणनीति तैयार हो चुकी है। शीघ्र ही इस पर अमल होते हुए दिखेगा।
वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव सपा और बसपा ने मिलकर लड़ा था। इसका फायदा बसपा को तो मिला, पर सपा को नहीं। पूर्वांचल की छह सीटें अंबेडकनगर, गाजीपुर, घोषी, जौनपुर, लालगंज और श्रावस्ती बसपा ने जीती थीं। वहीं, सपा के हिस्से सिर्फ आजमगढ़ आई, जहां से पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव जीते।
इसके पीछे की वजह समाजवादी मानते हैं कि सपा का वोट तो बसपा को ट्रांसफर हुआ, पर इसका उल्टा नहीं हुआ। नतीजतन, बलिया और चंदौली सीट वे बहुत ही कम मतों के अंतर से हारे। बसपा का जमीन पर साथ मिला होता तो बांदा, कौशाम्बी, राबर्ट्सगंज में परिणाम कुछ और ही होते। यहां सपा क्रमशः 58983, 38722 और 54336 मतों से हारी थी।
अखिलेश यादव के विधायक चुने जाने के बाद आजमगढ़ में हुए उपचुनाव में सपा ने पूर्वांचल की एकमात्र सीट भी खो दी। अब पार्टी का प्रयास है कि वह पूर्वांचल में शून्य से शिखर पर पहुंचे। बलिया, चंदौली, वाराणसी, आजमगढ़, मऊ, बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, सिद्धार्थनगर, महराजगंज और बस्ती समेत सभी जिलों में कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर लगाए जाएंगे।