समाजवादी पार्टी की रणनीति है कि जो जिताऊ उम्मीदवार है, उसे हर हाल में मैदान में उतारा जाएगा। वह चाहे पार्टी के मूल काडर का हो या दूसरे दल से आया हो। पार्टी नेतृत्व की इस रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं। पार्टी के अंदर कोई खुलकर सामने नहीं आ रहा है। पर, पिछले चुनाव से सड़क पर संघर्ष करने वाले तमाम नेता असहज हैं। वे चुनौती देने को तैयार हैं।
उनका कहना है कि जिन नेताओं के खिलाफ साढ़े चार साल संघर्ष किया, अब उन्हीं के लिए वोट मांगना मंजूर नहीं है। यह समस्या उन सीटों पर ज्यादा है, जहां मौजूदा विधायकों ने बड़ी संख्या में सपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ लगातार मुकदमे दर्ज कराए हैं। पार्टी में शामिल करते वक्त संबंधित नेता से मुकदमे वापस लेने संबंधी कोई समझौता भी नहीं कराया गया।
ऐसे में वहां के दावेदार सवाल कर रहे हैं कि जिस नेता पर दूसरे दल के विधायक ने मुकदमे दर्ज कराए हैं, उसे किस मुंह से उसी व्यक्ति के चुनाव प्रचार में लगने के लिए कहा जाए। इसी तरह दूसरे दल से आए विधायकों को उनकी सीट के बजाय मनपसंद सीट पर उतारने की रणनीति की भी मुखालफत हो रही है।
गुपचुप बांटे जा रहे हैं चुनाव चिह्न
समाजवादी पार्टी की ओर से अभी तक खुले तौर पर सिर्फ 10 सीटों का एलान किया गया है। अन्य सीटों पर गुपचुप तरीके से चुनाव चिह्न थमाए जा रहे हैं। इस रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं।
समाजवादी पार्टी के गठबंधन में शामिल प्रगतिशील समाजवादी पार्टी में भी हलचल है। मुलायम सिंह यादव के रिश्तेदार पूर्व विधायक प्रमोद गुप्ता भाजपा का दामन थामने को तैयार हैं। कई वरिष्ठ नेता भी विकल्प तलाश रहे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव का साफ कहना है कि उन्होंने करीब 25 लोगों की सूची सौंपी है। जिस उम्मीदवार से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव संतुष्ट होंगे, उन्हें टिकट मिलेगा। ऐसे में पार्टी से चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर चुके कई वरिष्ठ नेता दूसरा ठौर तलाश रहे हैं। प्रसपा से कुल 240 लोगों ने आवेदन किया था। इनमें करीब 70 ऐसे उम्मीदवार थे, जिन्होंने हर स्तर पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर ली थी।
जो जिताऊ हैं उन्हें टिकट दिया जा रहा
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि पार्टी टिकट उन्हें दे रही है, जो जिताऊ होंगे। जिसके पक्ष में जनता होगी। इसके लिए पार्टी की ओर से संबंधित लोगों के बारे में जनता की राय ली जा चुकी है। कई स्तरों पर सर्वे कराया है। जो समीकरण के हिसाब से फिट हैं। दूसरे दलों से जिन लोगों को जोड़ा गया है वे जनाधार वाले नेता हैं।