फैजाबाद में अपने जीवन के अंतिम दस वर्ष बिताने वाले गुमनामी बाबा की पहचान पर से पर्दा उठाने के हाईकोर्ट के आदेश के साढ़े तीन साल बाद प्रदेश का गृह विभाग जागा है। कुछ लोगों का दावा है कि गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे।
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इस मामले में जांच के लिए शासन ने हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज विष्णु सहाय की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया है। आयोग का कार्यकाल छह महीने का होगा, जरूरत पड़ने पर सरकार इसे बढ़ा सकती है।
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 31 जनवरी 2013 को दिए अपने फैसले में सरकार को तीन महीने में सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में आयोग बनाने का आदेश दिया था। गुमनामी बाबा फैजाबाद के रामभवन में रहते थे। 16 सितंबर 1985 को उनका निधन हो गया।
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कई लोगों का मानना था कि रामभवन में रहने वाले गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे, जो पहचान छिपाकर वहां रहते थे। हालांकि, वह हमेशा लोगों से दूरी बनाए रखते थे। स्थानीय लोगों का दावा है कि नेताजी के रिश्तेदार अक्सर यहां उनसे मिलने आते थे।
बाबा की मृत्यु के बाद उनकी भतीजी ललिता बोस भी 1986 में फैजाबाद आईं थीं। चश्मदीदों के अनुसार गुमनामी बाबा के सामान देखकर उन्होंने कहा था कि यह कोई और नहीं बल्कि नेताजी ही थे।
कोर्ट ने भी उन्हें माना था असाधारण व्यक्ति
रामभवन स्थित इसी कमरे में रहते थे गुमनामी बाबा
- फोटो : amar ujala
सुभाष चंद्र बोस विचार मंच ने हाईकोर्ट में रिट दायर की थी कि गुमनामी बाबा की पहचान को सामने लाया जाए और उनके सामान को सुरक्षित रखा जाए। हाईकोर्ट ने 31 जनवरी 2013 को दिए अपने आदेश में कहा कि गुमनामी बाबा के सामान को संरक्षित करने के लिए तीन महीने के भीतर संग्रहालय बनाया जाए।
यही नहीं, कोर्ट ने उन्हें असाधारण व्यक्ति मानते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया था कि एक आयोग गठित कर उनकी पहचान को लेकर उठ रहे सवालों को साफ किया जाए।
इस आदेश के तहत राज्य सरकार ने गुमनामी बाबा के सामान को अयोध्या के राम कथा संग्रहालय में रखवा दिया, लेकिन लंबे समय तक आयोग गठन का फैसला लटका रहा। 28 जून को गृह विभाग ने इस पर निर्णय लेते हुए जस्टिस विष्णु सहाय की अध्यक्षता में आयोग के गठन की अधिसूचना जारी कर दी।
प्रमुख सचिव गृह देवाशीष पंडा की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि हाईकोर्ट के आदेश के मद्देनजर जांच कराना जरूरी है। आयोग स्वर्गीय गुमनामी बाबा के बारे में जांच करेगा और अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपेगा।
जस्टिस सहाय की संस्तुति पर किसी सेवानिवृत्त जिला जज को आयोग का सचिव और संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों को सदस्य नामित किया जाएगा। आयोग का मुख्यालय लखनऊ में जबकि कैंप कार्यालय फैजाबाद में रहेगा।
क्या कहा था हाईकोर्ट ने
इसी कमरे में रहते थे गुमनामी बाबा
- फोटो : amar ujala
31 जनवरी 2013 के आदेश में हाईकोर्ट ने कहा था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े दस्तावेजों को तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है। पहला लिखित दस्तावेज, दूसरा वे सामान जिनका नेताजी से नाता होने का दावा किया जाता है और तीसरा परंपरागत साक्ष्य।
ये याचिकाएं फैजाबाद के सुभाष चंद्र बोस राष्ट्रीय विचार केंद्र और ललिता बोस ने दायर की थीं। अदालत ने कहा, दोनों याचिकाओं में जिन सामानों को भगवान जी उर्फ गुमनामी बाबा से जुड़े होने का दावा किया जा रहा है वे दूसरी श्रेणी के साक्ष्य में रखे जा सकते हैं।
न्यायमूर्ति देवीप्रसाद सिंह और न्यायमूर्ति वीरेंद्र कुमार दीक्षित ने राज्य सरकार को एक संग्रहालय बनवाने और गुमनामी बाबा के सभी सामान व दस्तावेज उसमें रखने का आदेश दिया था। इसमें वह सामान भी रखा जाना था जिसे मुखर्जी आयोग ने जांच के दौरान अपने कब्जे में लिया था।
इसी फैसले में अदालत ने सरकार को तीन महीने के भीतर हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज की अगुवाई में एक आयोग बनाने का आदेश दिया था। यह आयोग फैजाबाद के रामभवन में रहने वाले गुमनामी बाबा की पहचान करेगा। सरकार ने संग्रहालय बनवाकर बाबा का सामान तो वहां रखवा दिया लेकिन आयोग बनाने का नोटिफिकेशन मंगलवार को जारी किया।
पर्दे के पीछे से ही बात करते थे गुमनामी बाबा
गुमनामी बाबा का समाधि स्थल
- फोटो : amar ujala
गुमनामी बाबा को सबसे करीब से जानने वाले शहर के एक मात्र जीवित शख्स झारखंडी मोहल्ला निवासी डॉ. आरपी मिश्र हैं, लेकिन वह इस बारे में कभी किसी से कोई बात नहीं करते।
वह 1975 में गुमनामी बाबा के भक्त बने और बस्ती से उन्हें अयोध्या लाए। वहां उनका भेद न खुले इसलिए 1983 में फैजाबाद के ‘रामभवन’ में उनके लिए दो कमरे किराये पर लिए। जहां बाबा किसी से मिलते नहीं थे, एकांत में रहते थे। पर्दे के पीछे से ही लोगों से बातचीत करते और रात के अंधेरे में ही उन्हें जानने वाले उनसे मिलने आते थे।
यहां तक कि उनके मकान मालिक गुरुबसंत सिंह भी दो वर्षों में सामने से उनका चेहरा नहीं देख पाए। उनकी देखभाल के लिए सरस्वती देवी अपने बेटे राजकुमार मिश्र के साथ रहती थीं। यहीं पर 16 सितंबर 1985 को गुमनामी बाबा का देहांत हुआ था।
उनके शिष्यों ने 18 सितंबर को बाकायदे तिरंगे में लपेटकर पार्थिव शरीर को सरयू तट के गुप्तार घाट पर 13 लोगों की उपस्थिति में अन्तिम संस्कार किया। इसके बाद जब बाबा का सामान खुला तो उन्हें नेताजी सुभाषचंद्र मानने वालों की भीड़ लग गई।
रामभवन के निवासी और बचपन में बाबा का दुलार पाने वाले शक्ति सिंह कहते हैं कि जांच आयोग बनने से गुमनामी बाबा के रहस्यों से पर्दा उठेगा। उनका 31 वर्षों का संघर्ष अब सार्थक दिख रहा है।
पत्रकारों से बातचीत में बुधवार को उन्होंने माना कि गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे, उनके सामानों को देखने-समझने से तस्वीर सामने आ चुकी है। अब जांच आयोग की ओर से गुमनामी बाबा कौन थे? कहां से आए थे? उन्हें अमरिकी दूतावास पत्र क्यों लिखता था? नेताजी के सामान उनके पास कहां से आए? आजाद हिंद फौज के अफसर, खुफिया प्रमुख से लेकर परिवार व दोस्त-रिश्तेदार क्यों संपर्क में थे?
इसकी पड़ताल शुरू होते ही सच्चाई सामने आने लगेगी। कहा, आजादी के बाद से लगातार सत्तासीन कांग्रेस के रहनुमाओं ने नेताजी की मौत का भ्रम फैलाया।