लखनऊ। उड़ीसा के अस्पताल में हुए अग्निकांड से सबक लेने के बजाय राजधानी के स्वास्थ्य विभाग ने नियमों को ताक पर रख दिया है। शहर में पंजीकृत 900 से अधिक निजी अस्पतालों में से महज 211 के पास ही फायर एनओसी है। शेष 689 से अधिक अस्पताल बिना पुख्ता सुरक्षा इंतजाम के चल रहे हैं। कई अस्पताल तो संकरी गलियों, दुकानों और टिनशेड वाले कॉम्प्लेक्स में खुले हैं, जहां प्रवेश और निकास का रास्ता एक ही है। ऐसी स्थिति में आग लगने पर जान बचाना लगभग नामुमकिन होगा।
नोटिस देकर हो रही खानापूर्ति
स्वास्थ्य विभाग के छापे में कई बार खामियां मिलीं, लेकिन विभाग केवल नोटिस जारी कर खानापूर्ति कर रहा है। पंजीकरण के समय फायर एनओसी के बजाय संचालकों से केवल शपथ पत्र और अग्निशमन सिलिंडरों की फोटो लेकर फाइल पूरी कर दी जाती है। यह कागजी प्रक्रिया केवल विभाग की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए होती है, ताकि हादसे का दोष सीधे संचालक पर मढ़ा जा सके।
पंजीकरण के कड़े नियम, पर कागजों तक सीमित
नियमों के अनुसार, अस्पताल पंजीकरण के लिए स्वास्थ्य विभाग की वेबसाइट पर आवेदन के साथ फायर एनओसी, बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट एनओसी और कम से कम दो निकास द्वार अनिवार्य हैं। टीम की भौतिक जांच के बाद ही पंजीकरण होना चाहिए, लेकिन हकीकत में शपथ पत्र के खेल से मानक पूरे दिखाए जा रहे हैं।
Iनिजी अस्पतालों के विरुद्ध समय-समय पर अभियान चलाया जाता है। कमियां पाए जाने पर नोटिस देकर जवाब तलब किया जाता है। जवाब संतोषजनक न होने पर संचालन पर रोक लगाई जाती है।I
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-डॉ. एपी सिंह, नोडल, निजी अस्पतालI
पुरानी घटनाएं
14 अप्रैल 2025: लोकबंधु अस्पताल की दूसरी मंजिल पर शॉर्ट सर्किट से आग लगी।
2 जनवरी 2024: सिविल अस्पताल की पैथोलॉजी में आग लगी।
18 दिसंबर 2023: पीजीआई की ओटी में वेंटिलेटर फटने से लगी आग में दो लोगों की जान गई।
जुलाई 2017: केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में आग से पांच मरीजों की मौत हुई थी।