आजादी मिलने के बाद बीते 65 वर्षों में भले ही हम सब महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता समझते व लिखते आ रहे हों। भले ही हम अपने बच्चों को यही समझाते व सिखाते आ रहे हों।
राष्ट्रीय पर्व कौन से हैं? परीक्षा में पूछे गए इस सवाल के जवाब में हम सब 26 जनवरी व 15 अगस्त लिखते रहे हों।
पर, केंद्र सरकार के रिकार्ड का हवाला देते हुए केंद्रीय सूचना आयोग से मिली जानकारी की मानें तो इसमें कुछ भी सही नहीं है।
न तो गांधी जी को राष्ट्रपिता लिखने या कहने का कोई आदेश हुआ है। न गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस को राष्ट्रीय पर्व मानने के बारे में कभी कोई फैसला किया गया।
राजधानी के एक स्कूल की सातवीं क्लास की बच्ची और आरटीआई कार्यकर्ता ऐश्वर्या पाराशर ने इस बारे में केंद्र सरकार से जिज्ञासा भरे सवाल किए थे।
केंद्र की तरफ से दिए जवाब न सिर्फ चौंकाने वाले बल्कि सकते में डालने वाले हैं। ऐश्वर्या कहती है कि महात्मा गांधी राष्ट्रपिता नहीं तो क्या हैं? यह उलझन सिर्फ ऐश्वर्या की नहीं बल्कि तमाम लोगों की है।
इसका अर्थ तो यही हुआ कि अब तक हम जो कुछ पढ़ते आ रहे हैं, वह सही नहीं है। दरअसल, पाराशर के सवाल पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संविधान के अनुच्छेद 18 (1) का हवाला देकर महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करने से इन्कार करते हुए ऐश्वर्या की अर्जी को राष्ट्रीय अभिलेखागार भेज दिया।
इस पर ऐश्वर्या ने केंद्रीय सूचना आयोग में अपील की। केंद्रीय सूचना आयुक्त बसंत सेठ के 7 अगस्त के आदेश में कहा गया है कि केंद्र सरकार के पास महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता घोषित करने का कोई अभिलेख नहीं है। पर, पूरे देश द्वारा गांधीजी को आदरपूर्वक राष्ट्रपिता कहा जाता है।
यह उपाधि किसी अभिलेख की उपस्थिति या अनुपस्थिति की मोहताज नहीं है। ऐसे मामलों में अनावश्यक विवाद दुख पंहुचाने वाले हैं। ऐसे विवाद उठाने से बचना चाहिए।
इसी प्रकार केंद्रीय सूचना आयुक्त सुषमा सिंह ने 13 सितंबर के आदेश में कहा है कि गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जंयती को राष्ट्रीय पर्व घोषित करने संबंधी कोई भी आदेश जारी नहीं किया गया है।
इन जवाबों से निराश ऐश्वर्या का सवाल है कि हमारे देश के राजनेता जो कहते हैं, वह करते क्यों नहीं? उसकी उलझन है कि देश के नेता और प्रमुख पदों पर बैठे लोग टीवी और अपने भाषणों में गांधी को राष्ट्रपिता कहते नहीं थकते।
गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस को राष्ट्रीय पर्व बताते हैं। पर, इसके लिए अब तक कोई अधिकृत फैसला नहीं कर पाए। वह कहती है, जब बात राजनीतिक हितों पर चोट की आती है तो यही नेता आनन-फानन सुप्रीम कोर्ट का आदेश पलटने की तैयारी कर लेते हैं लेकिन इस बारे में बीते 65 वर्ष में कोई फैसला नहीं कर पाए।