फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दिल्ली में हार के बाद यूपी में सियासत को 'मोड़' देगा संघ!

Thu, 12 Feb 2015 09:25 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के 14 फरवरी से शुरू हो रहे कानपुर प्रवास ने सूबे के भगवा कुनबे के कर्ताधर्ताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं। सभी अपना-अपना रिपोर्ट कार्ड तैयार करने में जुटे हैं। साथ ही उन तर्कों को तलाशा व तराशा जा रहा है जिनके जरिये संघ प्रमुख के सवालों का सामना किया जा सके।
विज्ञापन


सूबे में भाजपा की नीति, रणनीति और निर्णयों से जुड़े लोग सबसे ज्यादा घबराए हुए हैं। भागवत 14 से 18 तक कानपुर में रहेंगे। एक दिन पहले वह 13 फरवरी को उन्नाव में अवध प्रांत के पूर्व प्रचारकों के साथ बैठक करेंगे।

वैसे तो यह दौरा पूर्व निर्धारित और सरसंघचालक के नियमित कार्यक्रम का हिस्सा है। पर, दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों से बदले हालात ने उनके दौरे को अहम बना दिया है।
विज्ञापन


दिल्ली परिणाम के बाद सरसंघचालक पहली बार संगठन के किसी औपचारिक फोरम पर लोगों से रूबरू होंगे। इसलिए नए संदर्भ में उत्तर प्रदेश में भगवा परिवार की मौजूदा स्थिति की समीक्षा होना स्वाभाविक है। खासतौर से भाजपा और संघ की। इसी आशंका से इनमें बेचैनी है।

संघ के एजेंडे में सबसे ऊपर मिशन 2017

संघ का बहुत पुराना सपना है कि यूपी में भगवा चेहरों की सत्ता रहे। इसके लिए वह राम जन्मभूमि आंदोलन से लेकर अन्य कई मुद्दों को उठाता रहा है।

भगवा सियासत के रणनीतिकारों को पता है कि उनकी रणनीति को मजबूत करने वाले सबसे ज्यादा साधन देश में अगर कहीं हैं तो यूपी में।

इसीलिए केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने के तुरंत बाद उसने यूपी में मिशन-2017 को अपने एजेंडे में सबसे ऊपर ले लिया है ताकि देश में भगवा सियासत मजबूत रहे।

जाहिर है, संघ कभी नहीं चाहेगा कि कुछ लोगों के अहंकार या मनमाने फैसलों से उसके लक्ष्य पाने में कोई विघ्न पड़े। इसके लिए सरसंघचालक के कानपुर प्रवास में कुछ कड़े फैसलों की पृष्ठभूमि बन सकती है।
विज्ञापन

अच्छे कार्यकर्ताओं से किया किनारा

संघ से जुड़े लोगों की मानें तो दिल्ली के नतीजे आने के बाद यूपी को लेकर उसकी चिंता बढ़नी स्वाभाविक है। यूपी के चेहरों की चाल-ढाल से पूरी तरह वाकिफ इन लोगों का कहना है कि यहां थोड़ी सी ढील दिल्ली से ज्यादा गंभीर चुनौतियों को जन्म दे सकती है। इसलिए कानपुर में इस बारे में विचार-विमर्श हो सकता है।

इसकी एक वजह दिल्ली के नतीजे आने के बाद प्रदेश में भाजपा के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा प्रदेश इकाई के नेताओं के कामकाज और व्यवहार पर नाराजगी जताना भी है। संघ नेतृत्व तक ऐसी खबरें पहुंच रही हैं कि सूबे में भाजपा के मौजूदा कर्णधारों का जनता से मेलजोल बढ़ाना तो दूर उल्टे निष्ठावान कार्यकर्ताओं को हाशिए पर डालना शुरू हो गया है।

सिर्फ गणेश परिक्रमा करने वाले व चाटुकार कार्यकर्ताओं को ही पद व प्रतिष्ठा मिल रही है। जनता तो दूर पार्टी कार्यकर्ताओं का भी पदाधिकारियों से मिलना मुश्किल हो गया है। यह सच्चाई प्रदेश में भाजपा के निर्णयों व रणनीति से जुडे़ लोगों पर संघ प्रमुख की नजरें टेढ़ी कर सकती है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें