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बसपा से अलग हुए आरके चौधरी ने मायावती पर लगाए गंभीर आरोप

Fri, 01 Jul 2016 02:21 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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आरके चौधरी व मायावती - फोटो : amar ujala
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पूर्व मंत्री और इलाहाबाद-मिर्जापुर के जोनल कोऑर्डिनेटर आरके चौधरी ने गुरुवार को बसपा छोड़ते समय पार्टी सुप्रीमो मायावती पर गंभीर आरोप लगाए। कहा, उनमें पैसा बटोरने की हवस है।
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यूपी प्रेस क्लब में मीडिया से मुखातिब चौधरी ने कहा कि महात्मा फुले, डॉ. अंबेडकर और कांशीराम के अनुयायियों व कार्यकर्ताओं में बेचैनी है कि मायावती बसपा के भविष्य को अंधकार में झोंककर धन उगाही में क्यों जुट गई हैं?

उनकी गलत नीतियों से देश भर में पार्टी का ग्राफ दिनों-दिन गिरता जा रहा है। पार्टी के तमाम मिशनरी नेताओं ने आरोप लगाए, पार्टी छोड़ी लेकिन मायावती में कोई सुधार नहीं दिख रहा। कांशीराम एक बार खुद कह चुके थे कि मायावती को पैसा बटोरने की हवस है।
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सामाजिक आंदोलन को किया मटियामेट
चौधरी ने कहा, कांशीराम जी ने अपना पूरा जीवन लगाकर देश में सामाजिक परिवर्तन का बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। उनकी मृत्यु के बाद मायावती ने सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को मटियामेट कर दिया। कांशीराम ने बहुजन समाज को नहीं बिकने वाला समाज बनाया लेकिन मायावती ने इसी समाज के वोट का सौदा शुरू कर दिया।

चौधरी 11 को करेंगे रणनीति का एलान

आरके चौधरी - फोटो : amar ujala
चौधरी ने कहा, मैं 1981 में कांशीराम से जुड़ा था। 2001 में आरक्षण विरोधी होने का झूठा आरोप लगाकर मुझे निकाल दिया गया। मैं किसी दल में नहीं गया। छोटे रूप में ही सही, बीएस-4 के जरिए सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को जारी रखा।

उन्होंने कहा, अगले 10 दिन तक साथियों से विचार-विमर्श करूंगा। 11 जुलाई को समर्थकों की बैठक में अगली रणनीति की घोषणा की जाएगी। उन्होंने स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ, भाजपा या किसी अन्य दल में जाने की संभावना पर कोई जवाब नहीं दिया।

चार बार विधायक रहे हैं चौधरी
आरके चौधरी सबसे पहले 1994 में मझनपुर (इलाहाबाद) से विधायक चुने गए थे। 1996, 2002 और 2007 में मोहनलालगंज से विधानसभा में पहुंचे। 2012 का विधानसभा चुनाव वह हार गए थे। दो बार वह बसपा और दो बार अपनी राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी से चुनाव जीते।

बहराइच, सुल्तानपुर में भी दो नेताओं ने छोड़ी बसपा
बहराइच में भी गुरुवार को बसपा के मंडल कोऑर्डिनेटर रामदेव आर्या समेत 100 से अधिक कार्यकर्ताओं ने पार्टी से नाता तोड़ लिया। उन्होंने कहा कि बसपा में अब ‘जिसकी जितनी थैली भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ की स्थिति है।

वहीं, सुल्तानपुर जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष सीताराम वर्मा ने भी बसपा छोड़ने का एलान किया। उन्होंने आरोप लगाया कि बसपा में निष्ठावान कार्यकर्ताओं का महत्व नहीं रहा। उन्होंने स्वामी प्रसाद मौर्य के समर्थन की बात कही।

पहले मायावती ने निकाला अब खुद छोड़ दी बसपा

- फोटो : amar ujala
आरके चौधरी बसपा में दूसरी पारी चार साल भी नहीं खेल पाए। उन्हें तीन साल दो महीने बाद ही उस बसपा से नाता तोड़ने को मजबूर होना पड़ा जिसे कभी उन्होंने कांशीराम के साथ मिलकर बनाया था।

चौधरी को दूसरी बार बसपा से अलग होना पड़ा है। फर्क यह है कि पहले उन्हें मायावती ने निकाला था। इस बार उन्होंने खुद बसपा छोड़ी है। स्वामी प्रसाद मौर्य के बाद चौधरी के रूप में दूसरे शख्स ने पार्टी छोड़ने का एलान करके मायावती को झटका दिया है।

फैजाबाद के रहने वाले चौधरी अनुसूचित जाति में जाटव के बाद सबसे बड़ी संख्या वाले पासी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। 1977-78 में उनकी मुलाकात कांशीराम से हुई और वे उनके सहयात्री बन गए।

उन्होंने पहले दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) में काम किया। इसके बाद जब बामसेफ का गठन हुआ तो उसमें भी कांशीराम का हाथ बंटाने लगे। दलित व शोषित समाज में चेतना के लिए आजीवन अविवाहित रहने का प्रण ले लिया और पूर्णकालिक कार्यकर्ता की तरह कांशीराम के साथ काम करने लगे। इसके साथ ही वकालत के जरिये भी उन्होंने दलितों व शोषितों पर होने वाले जुल्म के खिलाफ लड़ना शुरू किया।

समान विचारधारा के साथियों के साथ लड़ते रहे लड़ाई

प्रेस कांफ्रेस करते आर के चौधरी - फोटो : amar ujala
चौधरी ने समान विचारधारा वाले वकीलों को जोड़कर एक संगठन भी बनाया जो दलितों व शोषितों की कानूनी लड़ाई लड़ता था। चौधरी पहले डीएस-फोर व बामसेफ के मंडल अध्यक्ष रहे और बसपा के गठन के बाद उसके मंडल अध्यक्ष बना दिए गए।

1993 में बने मंत्री
वर्ष 1993 में जब सूबे में सपा-बसपा गठबंधन की सरकार बनी तो कांशीराम ने मुलायम सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनवाया। वे विधान परिषद में नेता सदन भी रहे। 1995 में पार्टी में मायावती का प्रभाव बढ़ने के साथ चौधरी और मायावती के बीच मतभेद गहराने लगे।

बसपा से अलगाव
बताया जाता है कि टिकटों की बिक्री और पासी समाज व पार्टी के अन्य संस्थापक सदस्यों की उपेक्षा पर मायावती से आरके चौधरी के मतभेद इस तरह बढ़े कि जुलाई 2001 में चौधरी को बसपा से निकाल दिया गया। इसके बाद चौधरी ने डीएस-4 की तर्ज पर बहुजन समाज स्वाभिमान संघर्ष समिति (बीएस-4) और फिर राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी बनाई। इसी पार्टी से उन्होंने 2002 का विधानसभा चुनाव लड़ा और जीते।

बसपा और भाजपा गठबंधन सरकार हटने के बाद बनी मुलायम सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया। चौधरी 2007 का भी विधानसभा चुनाव जीते, पर 2012 में पराजित हो गए।

मायावती ने बंद कर दिए सारे रास्ते

- फोटो : amar ujala
चौधरी को उम्मीद थी कि मायावती उन्हें 2017 में मोहनलालगंज से विधानसभा चुनाव लड़ाएंगी, पर लोकसभा चुनाव के बाद धीरे-धीरे उनका कद फिर छांटा जाने लगा।

बसपा में लौटने पर उन्हें लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी जोन का कोऑर्डिनेटर बनाया गया था, पर पिछले एक साल में पहले उनसे लखनऊ जोन का काम वापस ले लिया गया। फिर छह महीने पहले वाराणसी का भी प्रभार ले लिया।

यही नहीं, मोहनलालगंज सीट पर पूर्व आईएएस रामबहादुर को उम्मीदवार बनाकर उनके लिए सारे रास्ते बंद कर दिए गए। ऐसे में पिछली बार से सबक सीखे चौधरी ने मायावती को झटका देने का निर्णय कर लिया।

बसपा में हुई वापसी
पिछले लोकसभा चुनाव से पहले 11 अप्रैल 2013 को बसपा में चौधरी की वापसी हुई। दरअसल बसपा के पासी बिरादरी के प्रमुख नेता रामलखन पासी से अनबन के बाद मायावती ने उन्हें बसपा से निकाल दिया था। उसकी भरपाई के लिए चौधरी को बसपा में शामिल किया गया। बसपा ने चौधरी को 2014 का लोकसभा चुनाव मोहनलालगंज से लड़ाया, पर वह हार गए।
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चौधरी के बसपा छोड़ने के मायने

- फोटो : amar ujala
- बसपा को पासी समाज की नाराजगी का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

- चौधरी के बाद बसपा में पासी समाज के स्थापित नेताओं में इंद्रजीत सरोज ही हैं, पर उन्होंने खुद को  इलाहाबाद के आसपास तक ही सीमित कर लिया है।

- चौधरी के दूसरी बार बसपा से जाने के बाद बसपा में वापसी करने की सोच रहे नेताओं को कोई फैसला करने से पहले कई बार विचार करना पड़ेगा।

- चौधरी ने अगर सपा या भाजपा में से किसी से हाथ मिला लिया तो बसपा के दलित वोटों में ज्यादा सेंधमारी कर सकते हैं।

- अगर स्वामी प्रसाद मौर्य और आरके चौधरी ने साझा मोर्चा बनाकर किसी दल से गठबंधन किया तो बसपा को ज्यादा नुकसान होगा।

- मौर्य के अलग होने से कुशवाहा, काछी, मौर्य, मुराव, मुराई, शाक्य जैसी बिरादरी की 9 प्रतिशत आबादी की नाराजगी और अब अनुसूचित जाति में गैर जाटव 45 प्रतिशत जातियों में 16 प्रतिशत हिस्सेदारी वाली पासी बिरादरी की नाराजगी बड़ा उलटफेर कर सकती है।
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