इसलिए महत्वपूर्ण है भाजपा की जीत
उपचुनाव में मिली जीत न सिर्फ भाजपा का मनोबल बढ़ाने वाली है, बल्कि यह भी बताने वाली है कि धीरे-धीरे ही सही लेकिन भाजपा उन क्षेत्रों में भी जीत के समीकरणों का ताना-बाना तैयार करने में सफल हो रही है जो अब तक उसके लिए दुरूह थी। दूसरी तरफ सपा एम-वाई समीकरण पर ही जीत का भरोसा किए बैठी रही। नए मतदाता वर्ग को जोड़ने के उसके प्रयास स्थायी नहीं हैं। बीच-बीच में ब्राह्मण व अति पिछड़ी जातियों का कार्ड जरूर खेलती है, लेकिन कुछ ही दिन बाद वह फिर एमवाई फॉर्मूले पर काम करने लगती है। उधर, भाजपा न सिर्फ मुसलमानों के बीच पहले जैसा विरोध खत्म करने की ओर बढ़ रही है, बल्कि यादवों के बीच भी कुछ पैठ बढ़ाने में सफल रही है। गरीब कल्याण योजनाओं के साथ हिंदुत्व और गैर यादव तथा गैर जाटव समीकरणों पर काम करते हुए भाजपा अपना वोट बढ़ाने पर निरंतर काम कर रही है। जिसका उसे लाभ भी मिल रहा है ।
ये कैसी है अखिलेश की रणनीति
इन परिणामों पर भाजपा की कोशिशों का सीधा असर भले ही पड़ता न दिख रहा हो, लेकिन राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन की रणनीति से इसे ठीक से समझा जा सकता है। सपा के राज्यसभा के तीन उम्मीदवारों में जहां कोई आजम का करीबी तो कोई प्रो. रामगोपाल का और कपिल सिब्बल जैसे नेता भविष्य की जरूरत के लिहाज से समायोजन पाते दिखे। वहीं, भाजपा की सूची में बाबूराम निषाद, संगीता यादव, बनवारी लाल दोहरे, मिथिलेश जैसे चेहरे सामाजिक समीकरणों को मजबूती देते दिखे। वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र भट्ट कहते हैं कि गैर यादव और गैर जाटव समीकरणों पर राजनीति करने वाली भाजपा पिछले कुछ समय से यादव-जाटव समीकरणों को भी मजबूत कर रही है। लेकिन सपा मुस्लिम-यादव में ही उलझी है। सपा ब्राह्मणों को जोड़ने के लिए परशुराम की बात तो करती है, लेकिन जैसे ही ज्ञानवापी जैसे मुद्दे आते हैं तो वह फिर पुरानी राह पर चली जाती है। सपा को यदि भाजपा से पार पाना है तो उसे भाजपा की ओर से बिछाई गई समग्र हिंदुत्व की नई पिच पर खेलने का अभ्यास नए सिरे से करना होगा। सिर्फ हिंदुत्व के विरोध से मुस्लिमों को खुश करने की नीति छोड़नी होगी। यादव के साथ दूसरे लोगों को भी जोड़ना होगा। पर, अखिलेश के तेवर और अब तक की भूमिका को देखते हुए फिलहाल इसकी उम्मीद कम है कि वे खुद को या पार्टी की बदल पाएंगे।
ऐसे तो 2024 में भाजपा का मुकाबला मुश्किल होगा
सिर्फ नीति और रणनीति के स्तर पर ही नहीं, बल्कि सपा नेताओं की भूमिका को लेकर भी इस चुनाव ने काफी कुछ कह दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा से आरपार करने का दावा करने वाले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव आखिर उपचुनाव में प्रचार के लिए क्यों नहीं गए? वह भी तब जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तथा भाजपा के प्रदेश के नेता उपचुनाव को प्रतिष्ठा मानकर लड़ रहे थे। आखिर वे क्या वजहें रहीं जिनके कारण अखिलेश रामपुर एवं आजमगढ़ नहीं गए। आजमगढ़ सीट तो उनके ही त्यागपत्र देने से रिक्त हुई थी। यही नहीं, आजमगढ़ में उनके ही परिवार के सदस्य धर्मेंद्र यादव लड़ रहे थे। फिर भी वे प्रचार के लिए आजमगढ़ नहीं गए। उन्होंने रामपुर में भले ही आजम के दबाव में टिकट दिया था। पर, जिस तरह जेल से निकलने के बाद आजम उनको लेकर नाराजगी व्यक्त कर रहे थे उसको देखते हुए अखिलेश इस चुनाव के दौरान रामपुर में प्रचार करके आजम से रिश्ते सुधार सकते थे। पर, वे नहीं गए। इससे तो यही लगता है कि दोनों ही टिकट अखिलेश ने किसी दबाव में दिए थे। राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल कहते हैं कि अखिलेश ने यदि दबाव में भी ये टिकट दिए थे तो भी उन्हें प्रचार के लिए निकलना चाहिए था। ऐसा न करके उन्होंने राजनीतिक अदूरदर्शिता का परिचय दिया है। इसका असर आगे दिखेगा। जो भी हो लेकिन उपचुनाव के नतीजों ने बता दिया है कि सपा के भीतर के अंतर्विरोध खत्म नहीं हुए हैं। अगर यही हाल रहा तो सपा के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा का मुकाबला करना मुश्किल होगा।