सूबे में आजकल मुस्लिम सियासत गरमाई हुई है। वजह बनी है भाजपा और संघ नेताओं की अति सक्रियता। पहले उनके तीखे बयान और फिर आगरा में 57 मुस्लिम बंगाली परिवारों को कथित तौर पर हिंदू धर्म में शामिल करने के मामले ने मुस्लिम नेताओं को मुद्दा दे दिया है।
विज्ञापन
धर्मांतरण के खिलाफ जगह-जगह धरना-प्रदर्शन और जलसे हो रहे हैं। हालांकि घटना के अगले ही दिन नमाज पढ़वाकर इन परिवारों की फिर से इस्लाम धर्म में वापसी करा दी गई, लेकिन इस मुद्दे पर बनी गरमाहट कम होती नहीं दिख रही है।
वहीं, विहिप और हिंदूवादी नेता लगातार यह कहकर कि पूर्व में धर्म बदल चुके लोगों की घर वापसी के लिए और भी कार्यक्रम होंगे, माहौल को संवेदनशील बनाए रखने की कोशिश में लगे हैं।
विज्ञापन
उधर, मुस्लिम नेता भी भगवा टीम को उन्हीं की भाषा में जवाब देने के लिए तैयार बैठे हैं। कथित तौर पर धर्मांतरण वाले दिन से ही मुस्लिमों में उबाल है।
सपा की तरफ से आजम ने संभाला मोर्चा
संघ और भाजपा नेताओं के बयान हों या धर्मांतरण जैसे मुद्दे, इनका जवाब देने के लिए सपा महासचिव आजम खां ने मोर्चा संभाल रखा है। वे लगातार जवाबी हमले कर रहे हैं। कह रहे हैं कि प्रदेश में सहारनपुर और कांठ जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति की कोशिश की जा रही है।
यह सब 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए हो रहा है। वह सीधा निशाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फासिस्ट ताकतों पर साध रहे हैं। संघ के नेताओं को नसीहत दे रहे हैं कि पहले मंदिरों और दिलों के दरवाजे खोलो, फिर धर्म परिवर्तन कराना।
ओवैसी भी कूदे जंग में धर्मांतरण मुद्दे पर छिड़ी जंग में हैदराबाद के सांसद और एआईएमआईएम के अध्यक्ष असादुद्दीन ओवैसी भी कूद गए हैं। उन्होंने संघ से जुड़े हिंदूवादी संगठनों पर रोक लगाने की मांग उठाई है। आगरा में जबरन धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि हम (मुसलमान) आरएसएस और बजरंग दल से डरे हुए नहीं हैं।
ओवैसी की इस मुद्दे पर लोकसभा में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से बहस भी हुई। ओवैसी यूपी में सियासी सक्रियता बढ़ाना चाहते हैं। आजमगढ़ के संजरपुर गांव को गोद लेने की उनकी घोषणा को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।
गैर राजनीतिक संगठन भी हुए मुखर
इस मुद्दे पर गैर राजनीतिक मुस्लिम संगठन भी मुखर हो गए हैं। 12 दिसंबर को सूबे के अधिकतर जिलों में धर्मांतरण के खिलाफ प्रदर्शन किए गए। मुरादाबाद में धर्मांतरण के खिलाफ जामा मस्जिद के बाहर प्रदर्शन के साथ जलसा का आयोजन हुआ। इसमें इस्लामिक मोर्चा ऑफ इंडिया के संस्थापक मुस्तफा अली ने संसद से लेकर सेना तक को चुनौती दे डाली। कुछ और भी लोगों ने भड़काऊ भाषण दिए।
दूसरे दल भी पीछे नहीं सपा, बसपा, कांग्रेस, वामपंथी दल भी भाजपा नेताओं के विवादित बयानों और धर्मांतरण के मुद्दे पर पीछे नहीं रहे। इन दलों से जुड़े नेताओं ने धरना-प्रदर्शन से लेकर पुतला दहन तक के कार्यक्रमों में शिरकत की। संघ व भाजपा नेताओं पर राजनीतिक लाभ के लिए प्रदेश के माहौल को सांप्रदायिक बनाने का आरोप लगाए और कथित धर्मांतरण कराने वालों पर कड़ी कार्रवाई की भी मांग की।
संसद में हुई बहस धर्मांतरण के मुद्दे पर लोकसभा और राज्यसभा में बहस हो चुकी है। दोनों ही सदनों में विपक्षी दलों के सांसदों ने भाजपा और संघ पर हमला बोला। मुद्दों से ध्यान हटाने का आरोप लगाया। गौरतलब है कि लोकसभा में यूपी से मुस्लिम प्रतिनिधित्व नहीं है।
लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एसके द्विवेदी कहते हैं कि समुद्री मछलियों की एक प्रजाति ऐसी होती है जिसमें आगे भी आंख होती हैं और पीछे भी। हाल के घटनाक्रमों और बयानबाजी को देखकर लगता है कि भारतीय राजनीति की तुलना इन मछलियों से किया जाना ज्यादा गलत नहीं है।
प्रो. द्विवेदी कहते हैं, आधुनिक राजनीति स्वतंत्रता, समानता और पंथनिरपेक्षता के आधार पर चलती है जबकि परंपरागत राजनीति धर्म, क्षेत्र और भाषा के आधार पर। हमारा संविधान लागू हुए 64 साल हो गए हैं। हमें धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है। स्वेच्छा से कोई धर्म बदलना चाहे तो उस पर रोक नहीं है, लेकिन प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराना गलत है।
पिछले कुछ दिनों से धर्मांतरण को लेकर जिस तरह की बातें सामने आ रही हैं, जैसी बयानबाजी हो रही है, वह बेहद अफसोसनाक है। लगता है मोदी आगे की तरफ बढ़ना चाहते हैं लेकिन उनके कुछ सहयोगी (संघ से जुड़े संगठन) अभी पीछे ही देख रहे हैं। कोई गोडसे को राष्ट्रभक्त बता रहा है तो किसी की वाणी पर संयम नहीं है।
यही स्थिति दूसरी तरफ भी है। कुछ मुस्लिम नेता इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं मानो वे समुद्री मछली की तरह वे आगे के साथ पीछे भी देख रहे हैं। उनके बयानों में भी कट्टरता दिख रही है।