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राजनीति ने भ्रष्टाचार को बना दिया फूहड़ और बेशर्म

Tue, 01 Oct 2013 08:46 AM IST
मनोज श्रीवास्तव/लखनऊ
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भ्रष्टाचार उतना ही पुराना है जितनी राजनीति। फर्क सिर्फ इतना हुआ है कि पहले दाल में नमक होता था और अब नमक में दाल।
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एक फर्क यह भी कि सामाजिक न्याय की राजनीति में उभार आने के बाद भ्रष्टाचार फूहड़ और बेशर्म भी हुआ।

पुराने लोग बताते हैं कि पहली लोकसभा के समय जब फिरोज गांधी ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मूंदड़ा केस उठाया तो जवाहर लाल की सरकार हिल गई थी।

हिन्दुस्तान का मानस भी भ्रष्टाचार के नाम पर खूब उद्वेलित होता है। खुद कितना ही भ्रष्ट हो पर अपने नेता को ईमानदार देखना इसकी चाहत रहती है।

1977 और 1989 में क्रमश: जेपी आंदोलन और फिर राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह की बोर्फोसी दहाड़ के बल पर दिल्ली का निजाम इसीलिए पलटा खा गया कि मूल में भ्रष्टाचार था।

पर इधर सामाजिक न्याय की राजनीति के उभार के बाद राजनेताओं का भ्रष्टाचार और ज्यादा फला-फूला। लालू यादव और शिबू सोरेन की सरकारें रहीं हो या फिर मुलायम और मायावती की या फिर हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला की।
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कोई सरकार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से बची नहीं। पीपुल्स यूनियन आफ सिविल लिबर्टीज के चितरंजन सिंह मानते हैं कि सामाजिक न्याय के पैरोकारों के सत्ता में आने के बाद राजनीतिक भ्रष्टाचार न केवल बढ़ा है बल्कि फूहड़ और बेशर्म भी हुआ।

कहते हैं-सामाजिक न्याय के नाम पर ज्यादातर खाली पेट वाले सत्ता में आए। इनको धन की भूख कुछ ज्यादा थी। इसलिए अपना एजेंडा भूल केवल पैसा कमाने में लग गए। चूंकि हुनरमन्द भी ज्यादा नहीं थे, इसलिए पकड़ में भी आसानी से आ गए।

यूपी में भी सामाजिक न्याय की राजनीति भ्रष्टाचार से अछूती नहीं रही। मुलायम राज में हुए आयुर्वेद घोटाले, दादरी कांड ने तूल पकड़ा तो मायावती राज तमाम छोटे-मोटे घोटालों के अलावा एनआरएचएम घोटाले व चीनी मिलों की बिक्री के मसले पर खूब सुर्खियों में रहा।

इसका यह मतलब नहीं की भाजपा व कांग्रेस की सरकारें भ्रष्टाचार मुक्त थी। आपातकाल के पहले जेपी ने बाकायदा एक सभा में प्रदेश के एक कांग्रेसी मंत्री को अति भ्रष्ट करार दिया था।

कल्याण सिंह की अंतिम सरकार किसी तरह के आरोप से बची नहीं थी। हालांकि लखनऊ यूनिवर्सिटी में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. रमेश दीक्षित सामाजिक न्याय की ताकतों को भ्रष्टाचार से जोड़ने की बात से सहमत नहीं हैं। कहते हैं - अवमूल्यन के दौर में भ्रष्टाचार को किसी दायरे में बांधकर नहीं देखा जा सकता।
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कोई थोड़ा कम भ्रष्ट था, कोई थोड़ा ज्यादा। वहीं, समाजवादी पृष्ठभूमि वाले बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष चंचल कहते हैं कि कभी-कभी तो लगता है कि अब सरकारें केवल बजट लूटने के लिए बनती हैं। पर अब लालू यादव प्रकरण के बाद लगता है कि राजनेता भ्रष्टाचार करने में कुछ डरेंगे, क्योंकि चोर साहसी नहीं होते।

प्रकाश सिंह, के एल गुप्ता, एसएन शुक्ला, सीबी पाण्डेय से बातचीत
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