फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अखिलेश के लिए मुसीबत न बन जाएं 'नायक'

Wed, 23 Jul 2014 04:23 AM IST
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
राजभवन और राज्य सरकार के बीच रिश्तों की असल परीक्षा अब शुरू होगी। नवनियुक्त राज्यपाल आरएसएस की पृष्ठभूमि वाले हैं जो कि अखिलेश सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।
विज्ञापन


अगर अब तक देखें तो पिछले महीने राजभवन से विदा हुए बीएल जोशी जहां अपनी संजीदगी और संवैधानिक मर्यादाओं को दायरे में रहकर काम करने वाले राज्यपाल की छाप छोड़ गए, वहीं उनके बाद यूपी का अतिरिक्त प्रभार संभालने आए उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी एक महीने में ही कई परंपराओं को बदल गए।

राजभवन के दरवाजे जनता के लिए खोलने के साथ ही सार्वजनिक तौर पर सरकार के कामकाज को लेकर टिप्पणियां करने में भी वे पीछे नहीं रहे।

आजम खां के जौहर विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने संबंधी सात साल से अटके विधेयक को कुरैशी ने एक ही झटके में मंजूरी दे दी। लखनऊ से विदा होने से पहले दुष्कर्म पर भी उन्होंने विवादित बयान दे डाला।
विज्ञापन

जोशी ने रोका टकराव

कुरैशी ने अपने बयानों से कई बार सरकार के लिए असहज स्थिति तो पैदा की लेकिन रिश्तों में बहुत ज्यादा तल्खी नहीं दिखी। मंगलवार को भाजपा के दिग्गज नेता राम नाइक के राजभवन पहुंचने के बाद देखने वाली बात यह होगी कि सरकार के साथ उनके रिश्ते कैसे बनते हैं।

जोशी से पहले यूपी के राज्यपाल रहे टीवी राजेस्वर के कार्यकाल में राजभवन और जनता के बीच संवाद तकरीबन न के बराबर रहा।
2009 में बीएल जोशी के पदभार ग्रहण करने के बाद राजभवन की फिजां ही बदल गई। बीएल जोशी ने अपनी शख्सियत से प्रदेश में अलग पहचान बनाई।

चाहे बसपा की मायावती सरकार रही हो या सपा की अखिलेश सरकार, उन्होंने अपनी तरफ से ऐसी स्थिति नहीं आने दी जिससे राजभवन व सरकार के बीच टकराव के हालात पैदा होते।

आम के साथ खास लोगों से भी बढ़ाया मेलजोल

अपनी संवैधानिक सीमाओं में रहते हुए समय-समय जोशी सरकार को जरूरी सलाह व निर्देश देकर अपने दायित्वों के निर्वहन में भी पीछे नहीं रहे लेकिन सार्वजनिक तौर पर कभी भी उन्होंने सरकार की आलोचना नहीं की। यहां तक कि मुजफ्फरनगर दंगे पर भी उन्होंने मौन साधे रखा।

बतौर राज्यपाल जोशी प्रदेश में खासे सक्रिय रहे और लोगों से खूब मेल-जोल बढ़ाया। खास लोगों के साथ-साथ आम लोगों के लिए भी राजभवन के दरवाजे खुले।

जो भी राजभवन पहुंचा, उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। समय-समय पर उन्होंने गरीब व बेसहारा बच्चों और जरूरतमंदों को राजभवन में बुलाकर मदद भी की।

उनके जाने के बाद 23 जून को प्रदेश के राज्यपाल का पदभार संभालते ही डॉ. कुरैशी ने राजभवन में जनता दरबार लगाना शुरू कर दिया। आम या खास जो भी राजभवन पहुंचा, उसकी सुनी और दिल खोलकर बात की।
विज्ञापन

आरएसएस के सदस्य रहे राम नाइक

अपनी बात कहने में भी कुरैशी ने कोई हिचक नहीं दिखाई। उन्होंने सरकार के कामकाज, खास तौर पर कानून-व्यवस्था और बलात्कार की घटनाओं पर सार्वजनिक तौर पर टिप्पणी करने में भी कोई गुरेज नहीं किया।

डॉ. कुरैशी एकाएक तब ज्यादा ही चर्चा में आ गए जब उन्होंने सात साल से राजभवन में लंबित पड़े जौहर विवि विधेयक को हरी झंडी दे दी। विदाई की पूर्व संध्या पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने डॉ. कुरैशी के सम्मान में भोज का आयोजन भी किया।

नए राज्यपाल राम नाइक की छवि भी जमीनी नेता की है और वे सरल स्वभाव के माने जाते हैं। देखने वाली बात यह होगी कि अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले राम नाइक के साथ किस तरह तालमेल बिठा पाती है।

राजभवन और सरकार दोनों के लिए ही यह अग्निपरीक्षा होगी।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें