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कहीं सांसद के खिलाफ गुस्सा, कहीं खींचतान भारी पड़ी

Tue, 16 Sep 2014 09:12 PM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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विधानसभा उपचुनावों में भाजपा को कहीं सांसदों के खिलाफ गुस्सा भारी पड़ा तो कहीं पार्टी की खींचतान से नुकसान हुआ। ठाकुरद्वारा में सांसद कुंवर सर्वेश कुमार सिंह के बागी तेवर आखिर तक खत्म नहीं हुए।
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टिकट बंटवारे को लेकर पनपे आक्रोश ने भी भाजपा को भितरघात का शिकार बना दिया। इसके विपरीत सपा अपेक्षाकृत एकजुट नजर आई। सपा प्रत्याशियों के पक्ष में सरकार के मंत्रियों के वादों और विकास की उम्मीदों ने भी माहौल को अनुकूल बनाया।

खास बात यह रही कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी को छोड़कर किसी भी क्षेत्र में सभा नहीं की।

मैनपुरी के साथ ही शिवपाल सिंह यादव और रामगोपाल यादव ने आधा दर्जन विधानसभा क्षेत्रों में सभाएं कीं। भाजपा के राष्ट्रीय नेता भी चुनाव प्रचार से दूर रहे।
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ध्रुवीकरण का दिखा असर

सहारनपुर का हाल
दंगे का दंश झेल चुके सहारनपुर नगर क्षेत्र में भाजपा को काफी हद तक वोटों के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का लाभ मिला। हालांकि सपा के संजय गर्ग ने ध्रुवीकरण रोकने की पूरी कोशिश की लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी के मजबूती से चुनाव लड़ने से गैर भाजपा वोटों का बंटवारा नहीं रुक सका। इससे भाजपा की आसान जीत का रास्ता साफ हो गया।

बिजनौर: सांसद की नाराजगी भारी पड़ी
इस सीट पर सपा की रुचिवीरा ने भाजपा के हेमेंद्र पाल को पराजित किया। वर्ष 2012 के चुनाव में चौथे नंबर पर रहीं रुचिवीरा को हर जाति और धर्म का वोट मिला। वैश्य प्रत्याशी होने के बावजूद उन्हें जाट और दलित वोटों का एक हिस्सा भी मिला।

वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश में लगी सपा को जनता में स्थानीय सांसद के प्रति उपजी नाराजगी भी भारी पड़ी। मतदान के ठीक एक दिन पहले दिल्ली में चौधरी अजित सिंह की 12, तुगलक रोड स्थित कोठी को खाली कराना भी भाजपा के लिए नुकसानदायक रहा।

सपा की खराब छवि से हाथ से फिसली सीट

नोएडा: बाथम को छवि का लाभ मिला
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पड़ने वाली इस सीट पर सबसे कम मतदान हुआ था। साफ सुथरी छवि की बिमला बाथम यहां सपा की शर्मा पर भारी पड़ीं। पढ़े-लिखे मतदाताओं वाली इस सीट पर सपा को प्रत्याशी के पति की छवि का भी नुकसान हुआ। सांसद महेश चंद्र शर्मा की सक्रियता और व्यवहार का उन्हें लाभ मिला।

ठाकुरद्वारा: सर्वेश की बगावत ले डूबी
ठाकुरद्वारा उपचुनाव में भाजपा आखिर तक गुटबंदी ने नहीं उबर पाई। तमाम कोशिशों के बावजूद सांसद कुंवर सर्वेश कुमार सिंह की नाराजगी दूर नहीं हो पाई। सर्वेश इस सीट से अपने बेटे को चुनाव लड़ाना चाहते थे।

पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो उनके तेवर मतदान के दिन तक बागी रहे। वह भाजपा प्रत्याशी के चुनाव प्रचार में नहीं आए। 2012 में कांग्रेस के टिकट पर लड़कर नंबर दो पर रहे नवाब जान ने इस बार सपा प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की।

कहीं जीती सीट हारी तो कहीं प्रतिष्‍ठा बचाने में कामयाब

निघासन: प्रत्याशी-सांसद में रही खींचतान
निघासन सीट पर पूर्व मंत्री रामकुमार वर्मा को प्रत्याशी बनाने का विरोध था। सांसद अजय मिश्र उर्फ टेनी से भी उनकी अंदरूनी खींचतान दूर नहीं हो सकी। दूसरी तरफ सपा के कृष्ण गोपाल पटेल के लिए पूरी पार्टी एकजुट रही। दो कुर्मी नेताओं की खींचतान में सपा भारी पड़ी। पटेल ने वर्मा को 45, 976 वोटों के बड़े मार्जिन से शिकस्त दी।

लखनऊ पूरब: टंडन ने बचाई प्रतिष्ठा
राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र और कलराज मिश्र के इस्तीफे से खाली हुई लखनऊ पूरब सीट पर भाजपा प्रतिष्ठा बचाने में सफल रही है। यहां से पूर्व सांसद लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंडन भाजपा प्रत्याशी थे। उन्होंने सपा की जूही सिंह को 26 हजार से अधिक वोटों से हराया। एक तरह से यहां लालजी टंडन अपनी प्रतिष्ठा बचाने में सफल रहे हैं।

चरखारी: भाजपा की साख को धक्का
केंद्रीय मंत्री उमा भारती से इस्तीफे से खाली हुई महोबा जिले की चरखारी सीट पर भाजपा की साख को गहरा धक्का लगा है। इस सीट पर भाजपा मुख्य मुकाबले से बाहर रही। सपा के कप्तान सिंह राजपूत ने कांग्रेस के रामजीवन सिंह को 50 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। उमा भारती इस सीट पर प्रचार करने नहीं आईं।

एकजुटता न होने से मिली हार

हमीरपुर: खींचतान में सबसे बड़ी हार
साध्वी निरंजन ज्योति के इस्तीफे से खाली हुई हमीरपुर सीट पर भाजपा को सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा। सपा के शिवचरन प्रजापति ने यहां भाजपा के जगदीश प्रसाद को 68 हजार से ज्यादा वोटों से हराया। इस सीट पर भाजपा प्रत्याशी को साध्वी निरंजन ज्योति ने प्रचार जरूर किया लेकिन प्रत्याशी को लेकर चल रही पार्टी को भारी पड़ी।

बलहा: एकजुट नहीं रही भाजपा
भाजपा एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ सकी। लिहाजा सावित्री बाई फुले के सांसद चुने जाने से खाली हुई इस सीट पर सपा के बंशीधर बौद्ध ने भाजपा के अक्षयवर लाल को 25 हजार से ज्यादा वोटों से हराकर सीट पर कब्जा कर लिया। भाजपा में टिकट को लेकर मची खींचतान से भी नुकसान हुआ।
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यहां चल गया सपा का दलित कार्ड

सिराथू: काम आया सपा का दलित कार्ड
सिराथू सीट पर सपा ने दलित कार्ड खेला। यहां से बसपा के पूर्व विधायक वाचस्पति बौद्ध को उम्मीदवार बनाया। भाजपा ने संतोष सिंह पटेल पूरी पार्टी को एकजुट नहीं कर सके। नतीजतन सपा वाचस्पति ने पटेल को 25 हजार से ज्यादा वोटों से पराजित कर दिया।

रोहनिया: अनुप्रिया से नाराजगी महंगी पड़ी
अपना दल को रोहनिया सीट पर करारा झटका लगा है। इस सीट पर 2012 में अनुप्रिया पटेल जीती थीं। वह मिर्जापुर से सांसद चुनी गईं।

अपना दल ने उनकी मां कृष्णा पटेल को उम्मीदवार बनाया। अनुप्रिया से नाराजगी और भाजपा नेताओं से तालमेल की कमी के चलते सपा के महेंद्र पटेल ने उन्हें पराजित कर सीट पर कब्जा कर लिया।
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