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एसी कमरा, मुर्गा-मछली वालों ने डुबोई बसपा की लुटिया

Sun, 18 May 2014 08:44 PM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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बसपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ ही पार्टी कार्यकर्ता में भी हार को लेकर आक्रोश है कार्यकर्ताओं ने अब खुलकर शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया है।
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बसपा नेतृत्व लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के लिए बेशक पार्टी के खिलाफ सपा-भाजपा-कांग्रेस की मिलीभगत को जिम्मेदार ठहरा रहा हो, पर पर्दे के पीछे इसके  लिए कई दूसरी वजहें भी स्वीकार की जा रही हैं।

पिछले दो साल से चुनाव के लिए दिन-रात एक किए बसपा कैडर तमाम ऐसे कारण गिना रहा है, जिन्हें सुनना शायद ही बसपा नेतृत्व पसंद करे।
 
बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने 20 मई को देश भर के पार्टी नेताओं व पदाधिकारियों को लखनऊ बुलाया है।
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नेताओं की आरामतलबी ले डूबी

इस राष्ट्रीय सम्मेलन में जिम्मेदार पदाधिकारियों को लाने की तैयारी में लगे एक को-ऑर्डिनेटर बताते हैं कि पार्टी के कई बड़े नेताओं को एयर कंडीशंड (एसी) कमरा और मुर्गा-मछली का रोग लगा हुआ है।

वे जिले में आते हैं तो उनकी यही अपेक्षा होती है। वे इस सच को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि वे अब सत्ता में नहीं रहे।

नतीजा सामने है। पर, बसपा नेतृत्व के सामने यह सच बताने का साहस कौन जुटाए? एक अन्य जिला प्रभारी बताते हैं कि एक ओर पार्टी नेता कांग्रेस को उखाड़ फेंकने की बात करते रहे, दूसरी ओर दिल्ली में यूपीए सरकार को समर्थन देते रहे। जनता सब जानती है।

उसने कांग्रेस के भ्रष्टाचार व महंगाई के लिए बसपा को बराबर का जिम्मेदार माना और कहकर वोट नहीं दिया।

जनता के आक्रोश से नेतृत्व अंजान

हर बड़े नेता को जनता के आक्रोश की जानकारी थी। समय-समय पर हम लोग बताते भी रहे, लेकिन शायद किसी नेता ने पार्टी नेतृत्व के सामने यह बात नहीं रखी।

उन्हें मायावती से अपने बेटे-बेटियों, नाते-रिश्तेदारों के लिए टिकट मांगने में तो कोई मुश्किल नहीं आती लेकिन जहां सही बात बताने का मौका आता है, चुप्पी साध लेते हैं।

मध्य यूपी के एक को-ऑर्डिनेटर बताते हैं कि पार्टी सांप्रदायिक शक्तियों की मुखालफत और मुस्लिमों की पैरवी करती रही। इससे पूरा मिशन ही दरक गया।

केवल मुस्लिम-मुस्लिम की रट से दलित और पिछड़े सब भड़क गए। पार्टी ने पिछड़ों की उपेक्षा भी की।

भाजपा की तरफ गया ओबीसी

ओबीसी को सबसे कम मात्र 15 टिकट दिए। भाजपा ने 26 ओबीसी को टिकट दिया। ओबीसी आंख मूंदकर भाजपा की ओर चला गया। सपा तक को सीट के लाले पड़ गए।

भाजपा कल्याण सिंह व ओमप्रकाश सिंह जैसे पिछड़े नेताओं की अनदेखी का खामियाजा पहले भुगत चुकी थी।

उसने बसपा के सोशल इंजीनियरिंग के कंसेप्ट को इस बार वास्तविक रूप देकर मैदान मार लिया।
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ये भी कारण हैं हार के

-पार्टी प्रमोशन में आरक्षण की लड़ाई लड़ती रही और जिन दलितों के लिए यह लड़ाई लड़ी जा रही थी वे हिंदूवादी संगठनों के साथ चले गए। वहीं अपर कास्ट भी नाराज हो गया।

-बार-बार प्रत्याशियों को बदलना घातक साबित हुआ। रायबरेली, अमेठी, श्रावस्ती, गोंडा व बहराइच जैसी सीटों पर प्रत्याशी मुख्य लड़ाई में भी नहीं आ सके ।

-रायबरेली, गोंडा, श्रावस्ती, बहराइच, भदोही जैसी सीटों पर बाहरी लोगों को लाकर चुनाव लड़ाना गलत साबित हुआ। स्थानीय कैडर ने बाहरी प्रत्याशियों के साथ जुड़ाव नहीं महसूस किया।
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