विपक्ष, खास तौर से बसपा की कोशिश दिखती है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में दलितों की भाजपा के साथ लामबंदी को तोड़कर अगर इन सीटों का गणित गड़बड़ा दिया जाए तो केंद्र की सत्ता पर भगवा टोली की दावेदारी को कमजोर किया जा सकता है। वैसे भी बसपा की टीस रही है कि दलित बहुल इन सीटों पर उसे कभी वैसी बड़ी सफलता नहीं मिली जैसी भाजपा को मिलती रही है।
बसपा के रणनीतिकारों को शायद लग रहा है कि सपा के साथ होने का लाभ उठाकर अगर लोकसभा चुनाव में वह दलितों के मुद्दे को धार देकर इन सीटों में अधिकतर पर झंडा फहरा लेती है तो दलितों का प्रतिनिधित्व करने का उसका दावा और भी ज्यादा मजबूत हो जाएगा। साथ ही सत्ता तक भाजपा की पहुंच कमजोर करने में सफलता मिल जाएगी।
कारण यह भी
बीते तीन दशक में लोकसभा के सात चुनाव में इन सीटों पर बसपा की जीत का अधिकतम आंकड़ा पांच रहा है जबकि सपा का आंकड़ा 10 रहा है। सबसे ज्यादा सीटें जीतने की बात की जाए तो भी भाजपा ही नंबर एक रही है और अकेली पार्टी के रूप में उसने दो चुनाव को छोड़कर पांच में अन्य किसी एक दल से अधिक सीटें जीतकर अपनी पकड़ साबित की है।
वर्ष--भाजपा--बसपा--कांग्रेस--सपा--अन्य
1991--09--00--01--00--08
1996--14--02--00--02--00
1998--11--02--00--05--00
1999--07--05--00--05--01
उत्तराखंड अलग होने के बाद 17 सीटों का हाल
2004--03--05--01--07--01
2009--02--02--02--10--01
2014--17--00--00--00--00