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25 बेड खाली फिर भी लौटाए जा रहे मरीज

Wed, 15 Jan 2014 10:20 AM IST
मनीष कुमार सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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लखीमपुर के बाबू राम सर्राफ नगर के रहने वाली लज्जावती (50) को सिर में दर्द और खून की उल्टी के बाद परिवारीजन ट्रॉमा लेकर पहुंचे।
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पर्चा (संख्या 1821) बनने के बाद इमरजेंसी में गए तो डॉक्टरों ने कह दिया की हमारे पास न्यूरो वार्ड में जगह नहीं है। मरीज की हालत बेहद खराब है इसे दूसरे अस्पताल में भर्ती करवाओ।

सीतापुर के गुड्डू (30) को पेट में भयंकर दर्द के बाद सोमवार को सुबह ग्यारह बजे ट्रॉमा सेंटर लाया गया। डॉक्टर ने जांच की तो पता चला कि दर्द से राहत दिलाने के लिए पेट का ऑपरेशन करना पड़ेगा।
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सर्जरी वार्ड में जगह न होने के चलते भर्ती नहीं किया गया। उल्टे डॉक्टर ने यूरिनल बैग लगा दिया जिसके साथ मरीज बेड खाली होने के इंतजार में रैन बसेरे में ठिठुरता मिला।

ठाकुरगंज से आए देवी प्रसाद (70) को दोपहर एक बजे अचानक सिर में तेज दर्द की शिकायत हुई। उनके भतीजे विनीत श्रीवास्तव ऑटो से उनको ट्रॉमा सेंटर लेकर पहुंचे।

इमरजेंसी में गए तो डॉक्टर ने कह दिया की इनको ब्रेन हैमरेज हो गया है। न्यूरो में बेड खाली नहीं है किसी दूसरे अस्पताल लेकर जाओ।

केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में आने वाले मरीजों को बेड न खाली होने की बात कहकर वापस किया जा रहा है।

वहीं दूसरी तरफ अस्पताल के डिजास्टर वार्ड में लंबे समय से किसी मरीज की भर्ती नहीं हुई। मंगलवार को अमर उजाला की टीम हालात देखने पहुंची तो यह हालात सामने आए।

दूर-दराज से आए मरीज भर्ती होने के इंतजार में सर्द मौसम में अस्पताल के बाहर खुले में रात काटने को मजबूर थे। इसके बाद भी डिजास्टर वार्ड पर अस्पताल प्रशासन उपयोग पर कोई निर्णय नहीं ले सका है।

प्रशासन बेड फुल होने की बात कहकर मरीजों को बिना इलाज दिए वापस तो लौटा रहा है। लेकिन बढ़ रहे मरीजों की संख्या को डिजास्टर मानने को अधिकारी तैयार नहीं हैं। एक दिन पहले ही ट्रॉमा सेंटर में नए मरीजों की भर्ती पर पूरी तरह रोक लगा दी गई।

जबकि अस्पताल के दूसरे तल पर कैंटीन के साथ बने 25 बेड के डिजास्टर प्रबंधन वार्ड महीनों से खाली पड़ा है। वार्ड में कोई घुस न पाए इसके लिए उसके गेट पर ताला जड़ दिया गया है।

यह कैसा डिजास्टर प्रबंधन
ट्रॉमा के दूसरे तल पर 25 बेड की क्षमता वाला डिजास्टर प्रबंधन वार्ड किस डिजास्टर का इंतजार कर रहा है इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है।

जबकि पिछले दो दिन से ट्रॉमा में बेड फुल होने से सैकड़ों की संख्या में मरीजों की भर्ती नहीं हो पाई है और उनको वापस किया जा रहा है।

वार्ड में बेड पूरी तरह तैयार हैं। मरीजों की सुविधा के लिए सभी इंतजाम हैं। लेकिन डिजास्टर के लिए बना वार्ड डिजास्टर आने पर ही खुलेगा इसकी जिद्द के चलते गरीब और असहाय मरीजों को मजबूर होकर निजी अस्पतालों में हजारों रुपए खर्च कर भर्ती होना पड़ रहा है।

हालात यह हैं कि करीब छह महीने पहले केवल एक बार इस वार्ड में फू ड प्वॉइजनिंग के तीन मरीजों को भर्ती किया गया था।

स्टाफ मिले तो खुले वार्ड
अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि वार्ड को खोलने के लिए डॉक्टरों की तो नहीं लेकिन थर्ड और फोर्थ क्लास के कर्मचारियों की जरूरत पड़ सकती है।

इसमें प्रमुख रूप से पंद्रह पैरामेडिकल स्टाफ और पंद्रह चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की जरूरत पड़ेगी। जिससे वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों की बेहतर तरीके से देखरेख की जा सके।

ट्रॉमा के वार्डो में भी बुरा हाल
ट्रॉमा सेंटर में बेड के संकट के चलते वार्डो में बुरा हाल है। चौबीस बेड की क्षमता वाले सर्जरी वार्ड में 28 से अधिक मरीजों का इलाज चल रहा है।

खराब हालात के बीच अस्पताल के पहले तल पर बने सर्जरी वार्ड के ए ब्लॉक में बेड नंबर चार और पांच के बीच (पर्चा संख्या जीमीएच 000454) अंबेडकरनगर के गोपीपुर से आए रामकेवल दो दिन से स्ट्रेचर पर लेटे हैं। रामकेवल को सड़क हादसे में चोट लग गई थी।

इमरजेंसी में इलाज के बाद उन्हें वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। बेटे राजेश कुमार ने बताया कि सोमवार को दोपहर दस बजे वो पिता को लेकर अस्पताल आया था। दोपहर दो बजे के बाद वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। लेकिन बेड न खाली होने से स्ट्रेचर पर ही इलाज चल रहा है।

मरीज को संभालने और बेड से गिरने से बचाने के लिए वो दिन रात बेड के किनारे खड़े रहते हैं। यही नहीं मरीज को ग्लूकोज की ड्रिप तो लगा दी गई है लेकिन बोतल को फंसाने के लिए स्टैंड नहीं दिया गया जिससे बोतल को टांगा जा सके।

इस वजह से कई मरीज ग्लूकोज की बोतल हाथ में ही रखकर मरीज को ड्रिप चढ़वाने को मजबूर हैं। इसी तरह  दूसरे तल पर बने न्यूरो सर्जरी और डिजास्टर रूम में भी मरीजों की भर्ती की व्यवस्था पूरी तरह फेल हो गई है।

न्यूरो के मरीजों को भर्ती पर रोक लगी है तो वहीं जो मरीज थोड़ा सा भी राहत महसूस कर रहा है उसे बेड खाली कराने के लिए डिस्चार्ज कर दिया जा रहा है।

जांच भी पहुंची वेटिंग में
ट्रॉमा सेंटर पहुंचने वाले मरीजों की भीड़भाड़ और अफरा-तफरी के चलते जांच भी वेटिंग पहुंच चुकी है।

इमरजेंसी के सामने बने अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे जांच केंद्र पर तीमारदार मरीज को लेकर घंटो से जांच कराने के लिए इंतजार करते रहे लेकिन अधिक भीड़भाड़ होने के चलते जांच में देरी हो रही है।

सर्जरी वार्ड के बी ब्लॉक में भर्ती मरीज राम प्रकाश के भाई संतोष ने बताया कि दो दिन बाद रामप्रकाश की पेट की सर्जरी होनी हैं। अल्ट्रासाउंड जांच कराने के लिए ग्यारह बजे से स्ट्रेचर पर लेटे हैं लेकिन दो बजे तक जांच नहीं हो सकी।

इसी तरह बाराबंकी के फिरोज का सड़क हादसे में पैर टूट गया था। इमरजेंसी में डॉक्टर ने कच्चा प्लास्टर चढ़ा दिया लेकिन दर्द कम नहीं हुआ। डॉक्टर ने एक्स-रे लिख दी लेकिन दो घंटे के इंतजार के बाद भी जांच नहीं हो सकी।

अस्पताल सूत्रो से मिली जानकारी के मुताबिक मरीजों की अधिक भीड़ के चलते कई मरीजों को जांच के लिए सोमवार के बाद बुलाया गया और मौजूदा समय में सिर्फ इमरजेंसी जांच ही की जा रही है।

तीमारदार धकेलते मिले स्ट्रेचर
मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने का वादा करने वाला ट्रॉमा सेंटर के सभी दावे पटरी से उतर गई है।

स्थिति ये है कि गंभीर मरीजों की जांच से लेकर वार्ड में बेड पहुंचाने के लिए वार्ड ब्वाए की बजाए तीमारदार ही स्ट्रेचर धकेलने को मजबूर हैं जबकि वार्ड ब्वाए वार्डो में बैठकर अपनी ड्यूटी बजा रहे हैं।
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तीमारदारों द्वारा मरीजों को स्ट्रेचर शिफ्टिंग के दौरान कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। लेकिन किसी भी मरीज के साथ कोई वार्ड ब्वाए और लिफ्ट में लिफ्ट मैन रहने को तैयार नहीं है।
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