यहां के रेलवे स्टेशन पर उतरते ही अकाल की आहट मिलने लगती है। चाहे दिल्ली की तरफ जाने वाली ट्रेन हो या फिर मुंबई, चेन्नई, अहमदाबाद की ओर जाने वाली ट्रेन, सभी के जनरल डिब्बों में घुसने की मारामारी है।
प्लास्टिक की बोरियों में कुछ बर्तन व दो-चार दिन का राशन भरे बाहरी शहरों का रुख करने वाले ये वे किसान हैं, जो फसल तबाह होने के बाद पेट की आग बुझाने के लिए पलायन करने को मजबूर हैं।
मऊरानीपुर ब्लॉक के धवाकर गांव के रामलाल रायकवार भी पत्नी व तीन बच्चों के साथ सूरत जाने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहे हैं। कुरेदने पर मानो फट पड़ते हैं- ‘साब, न दैव सुन रओ न दाता, ऐसे में इतै रये तो बस मरनई है’।
सात बीघा जमीन के मालिक रामलाल कहते हैं- ‘घर में पांच सेर चून बचो तो, दो सेर की लुचईं बना लई रस्ता खों ओर बाकी बुरिया में रख लओ।
अब सूरत पोंच के कमायें तबईं मोड़ी-मोड़ा पल पयें’। यह कहानी रामलाल नहीं बल्कि उन जैसे हजारों किसानों की की है जो रोटी की तलाश में अपना गांव छोड़ गए हैं।