जिस बेटी को पढ़ा-लिखाकर माता-पिता उसकी डोली सजाने का ख्वाब संजोए थे, उन्हें उसी बेटी की अर्थी देखनी पड़ी। इससे ज्यादा दर्दनाक और क्या हो सकता है...।
बात ‘महादानी बिटिया’ दीक्षा की हो रही है। असहनीय दुख के बावजूद दीक्षा के माता-पिता ने उसके ब्रेनडेड होने के बाद अंगदान का साहसिक फैसला लिया। इस अंगदान से पांच लोगों को नई जिंदगी मिली।
मां रेनू, पिता अनिल श्रीवास्तव बेटी दीक्षा की मौत पर गमजदा तो हैं, पर उन्हें इस बात की तसल्ली भी है कि दीक्षा जाते-जाते महादान का सबक दे गई। अब उन्होंने दूसरे परिवारों को भी अंगदान के लिए जागरूक करने का संकल्प लिया है। कहते हैं कि कौन कह रहा दीक्षा नहीं रही। वह तो अब पांच लोगों के शरीर में जिंदा है....
लाडली की शव लेने पहुंचे, जाते-जाते कर गया वादा
अंगदान के बाद शनिवार को दीक्षा की देह लेने केजीएमयू के शताब्दी फेज-टू अस्पताल पहुंचे उसके परिवार के आंसू थम नहीं रहे थे। पिता अनिल और मामा शिशिर श्रीवास्तव की हालत तो ऐसी थी कि वे घाट तक जाने की स्थिति में नहीं थे।
इन सबके बावजूद उनकी संवेदनशीलता और इंसानियत बेहद मजबूती के साथ उनका सहारा बने खड़ी दिखी। जाने से पहले उन्होंने अंगदान व प्रत्यारोपण के लिए काम कर रहे डॉक्टर्स और परिवार की काउंसलिंग कर रहे कार्यकर्ताओं से बात की।
कहा, भविष्य में ब्रेन डेड केस में किसी परिवार से बातचीत के दौरान उन्हें इसके महत्व और जरूरत पर समझाना हो तो उनसे संपर्क किया जा सकता है। वे इस नेक काम में परिवारों को प्रेरित करने के लिए उपलब्ध रहेंगे। उन्होंने अपने फोन नंबर काउंसलर्स के पास दर्ज करवाए और उनके संपर्क भी लिए।