नजीर बनारसी लिखते हैं कि यह सुनकर मिर्जा साहब उठ लिए। उनके साथ मौलवी शिवनाथ प्रसाद भी उठ खड़े हुए। डॉ. साहब ने उनसे पूछा,आप कहां चले। शिवनाथ प्रसाद बोले, हम लोग मिर्जा साहब के नेतृत्व में उर्दू भाषा को महत्व के बारे में ज्ञापन देने आए थे। मुख्यमंत्री ने मिर्जा के हाथ से ज्ञापन छीनते हुए कहा, जाइए!ए मैं नहीं जानता कि उर्दू किस गली में बोली जाती है। बकौल नजीर बनारसी, गलती मिर्जा साहब की थी। उर्दू पर बात करने गए थे तो उसी पर करते, लेकिन पता नहीं क्यों उन्होंने दूसरे मुद्दे पर डॉ. संपूर्णानंद जी से बेतुके लहजे में बात शुरू कर दी, जिसका हम लोगों से कुछ लेना-देना नहीं था। अगले दिन के अखबार इस खबर से रंगे थे, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का मुसलमानों से कहना है, हमेशा अरब एवं ईरान की तरफ न देखा करें। इन खबरों को देखकर मेरी समझ में आ गया कि मिर्जा का मकसद उर्दू के सम्मान एवं उसको बढ़ावा दिलाने के लिए सरकार से आग्रह करना नहीं था, बल्कि साजिश करके डॉ. साहब को गुस्सा दिलाकर उनके उर्दू और मुस्लिम विरोधी होने का प्रचार कराना था।
सम्मान करूंगा, पर भाषा पर सियासत स्वीकार नहीं
नजीर बनारसी लिखते हैं कि जो व्यक्ति अपने आवास पर मुशायरा कराता था। शायरों की आर्थिक मदद करता था, वह उर्दू के विकास एवं महत्व की बात पर नाराज नहीं हो सकता था। पर, मिर्जा ने बात ही बेतुकी की थी। इस घटना के कुछ दिन बाद मुख्यमंत्री आवास पर मुशायरा हुआ, जिसमें नजीर बनारसी के साथ नवाब जाफर अली खां, असर लखनवी, अमीर सलोनवी भी शामिल थे। मुशायरे के अगले दिन मुख्यमंत्री आवास पर जब सभी शायर चाय पी रहे थे, तो डॉ. संपूर्णानंद नजीर बनारसी से बोले-उस दिन मिर्जा असगर की हरकत देखी। कैसी साजिश कर मुझे बदनाम कराया। नजीर साहब कुछ जवाब देते उससे पहले डॉ. संपूर्णानंद बोले, बात इतनी भर है कि भाषा का सम्मान जरूरी है या उस पर सियासत। सम्मान करूंगा, पर सियासत स्वीकार नहीं। वह भी भाषा के मुद्दे पर हिंदू-मुस्लिम करने की सियासत तो किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं। जब ईरान वाले रुस्तम और सोहराब पर फख्र करते हैं, तो हम अपने पूर्वजों पर क्यों नहीं कर सकते।