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अतीत के झरोखा: डॉ. संपूर्णानंद बोले, हर वक्त अरब व ईरान की तरफ न देखा करें...

Wed, 12 Jan 2022 06:24 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ

सार

मिर्जा ने कहा, गांधी तो कहा करते थे कि हुकूमत शेखैन के नक्शे कदम पर चलेगी। पर, आप तो बिल्कुल उसके बरअक्स (उल्टा) चल रहे हैं। ऐसा क्यों है? डॉ. संपूर्णानंद ने एक बार मिर्जा साहब को कड़ी निगाहों से देखा और बोले, आप हर वक्त अरब और ईरान की तरफ न देखा करिए। यहां के पूर्वजों का भी आदर करना सीखिए।
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डॉ. संपूर्णानंद - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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डॉ. संपूर्णानंद न सिर्फ  कांग्रेस के बड़े नेता, बल्कि प्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री भी रहे। वाराणसी में पैदा हुए डॉ. संपूर्णानंद मूल रूप से अध्यापक एवं दर्शनशास्त्री थे। वे हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू सहित कई भाषाओं के विद्वान थे। पत्रकार, संपादक, साहित्यकार, शायर एवं कवि होने के साथ-साथ वह बड़े शिक्षाशास्त्री, संस्कृत एवं संस्कृति के प्रति आस्थावान राजनेता थे। महात्मा गांधी से प्रभावित होकर उन्होंने नौकरी छोड़ी एवं स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। वाराणसी का संस्कृत विश्वविद्यालय उन्होंने ही स्थापित किया था, जिसका नाम बाद में उनके नाम पर कर दिया गया।

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बतौर शिक्षा मंत्री उन्होंने संस्कृत विश्वविद्यालय में वेधशाला स्थापित कराई थी, ताकि ग्रहों-नक्षत्रों के बारे में शोध कर खगोलशास्त्र को और संपन्न बनाया जा सके। यह किस्सा उन दिनों का है जब डॉ. संपूर्णानंद प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। बताते चलें कि देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जब गोविंद वल्लभ पंत को दिल्ली बुलाकर गृहमंत्री बना दिया, तो प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी डॉ. संपूर्णानंद ने संभाली। मशहूर शायर नजीर बनारसी के संस्मरण से पता चलता है कि डॉ. संपूर्णानंद जी प्रदेश के मुख्यमंत्री हुए तो बनारस के मिर्जा असगर हुसैन साहब जिनका अतातुर्क होटल था, उन्होंने उर्दू भाषा को महत्व और उसे दूसरी राजभाषा का दर्जा देने की मांग को लेकर सरकार को ज्ञापन देने का फैसला किया। मिर्जा असगर हुसैन स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में संपूर्णानंद के साथ ही जेल में रहे थे। पर, बाद में वह कांग्रेस से जमाते इस्लामी में शामिल हो गए थे।

अपने पूर्वजों का भी सम्मान करना सीखिए
सात आदमियों का प्रतिनिधिमंडल वाराणसी से लखनऊ पहुंचा। मिर्जा असगर हुसैन के नेतृत्व में लखनऊ पहुंचे इस प्रतिनिधिमंडल में नजीर बनारसी के अलावा मौलवी शिवनाथ प्रसाद, मसूद अख्तर जमाल, एडवोकेट इश्तियाक हुसैन, नेशनल हाईस्कूल पीली कोठी के मास्टर अब्दुल बारी और एडवोकेट हबीबुल्ला भी थे। मुख्यमंत्री को खबर मिली, तो वह पूरी गर्मजोशी से मिले। बकौल नजीर बनारसी, बात तो उर्दू को सरकारी महत्व पर होनी चाहिए थी लेकिन मिर्जा असगर हुसैन का जैसे ही डॉ. संपूर्णानंद जी से सामना हुआ, उन्होंने अचानक गरम लहजे में अलग मुद्दे पर बात करनी शुरू कर दी। मिर्जा ने कहा, गांधी तो कहा करते थे कि हुकूमत शेखैन के नक्शे कदम पर चलेगी। पर, आप तो बिल्कुल उसके बरअक्स (उल्टा) चल रहे हैं। ऐसा क्यों है? डॉ. संपूर्णानंद ने एक बार मिर्जा साहब को कड़ी निगाहों से देखा और बोले, आप हर वक्त अरब और ईरान की तरफ न देखा करिए। यहां के पूर्वजों का भी आदर करना सीखिए।

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संपूर्णानंद को बदनाम करने की साजिश

नजीर बनारसी लिखते हैं कि यह सुनकर मिर्जा साहब उठ लिए। उनके साथ मौलवी शिवनाथ प्रसाद भी उठ खड़े हुए। डॉ. साहब ने उनसे पूछा,आप कहां चले। शिवनाथ प्रसाद बोले, हम लोग मिर्जा साहब के नेतृत्व में उर्दू भाषा को महत्व के बारे में ज्ञापन देने आए थे। मुख्यमंत्री ने मिर्जा के हाथ से ज्ञापन छीनते हुए कहा, जाइए!ए मैं नहीं जानता कि उर्दू किस गली में बोली जाती है। बकौल नजीर बनारसी, गलती मिर्जा साहब की थी। उर्दू पर बात करने गए थे तो उसी पर करते, लेकिन पता नहीं क्यों उन्होंने दूसरे मुद्दे पर डॉ. संपूर्णानंद जी से बेतुके लहजे में बात शुरू कर दी, जिसका हम लोगों से कुछ लेना-देना नहीं था। अगले दिन के अखबार इस खबर से रंगे थे, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का मुसलमानों से कहना है, हमेशा अरब एवं ईरान की तरफ  न देखा करें। इन खबरों को देखकर मेरी समझ में आ गया कि मिर्जा का मकसद उर्दू के सम्मान एवं उसको बढ़ावा दिलाने के लिए सरकार से आग्रह करना नहीं था, बल्कि साजिश करके डॉ. साहब को गुस्सा दिलाकर उनके उर्दू और मुस्लिम विरोधी होने का प्रचार कराना था।

सम्मान करूंगा, पर भाषा पर सियासत स्वीकार नहीं
नजीर बनारसी लिखते हैं कि जो व्यक्ति अपने आवास पर मुशायरा कराता था। शायरों की आर्थिक मदद करता था, वह उर्दू के विकास एवं महत्व की बात पर नाराज नहीं हो सकता था। पर,  मिर्जा ने बात ही बेतुकी की थी। इस घटना के कुछ दिन बाद मुख्यमंत्री आवास पर मुशायरा हुआ, जिसमें नजीर बनारसी के साथ नवाब जाफर अली खां, असर लखनवी, अमीर सलोनवी भी शामिल थे। मुशायरे के अगले दिन मुख्यमंत्री आवास पर जब सभी शायर चाय पी रहे थे, तो डॉ. संपूर्णानंद नजीर बनारसी से बोले-उस दिन मिर्जा असगर की हरकत देखी। कैसी साजिश कर मुझे बदनाम कराया। नजीर साहब कुछ जवाब देते उससे पहले डॉ. संपूर्णानंद बोले, बात इतनी भर है कि भाषा का सम्मान जरूरी है या उस पर सियासत। सम्मान करूंगा, पर सियासत स्वीकार नहीं। वह भी भाषा के मुद्दे पर हिंदू-मुस्लिम करने की सियासत तो किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं। जब ईरान वाले रुस्तम और सोहराब पर फख्र करते हैं, तो हम अपने पूर्वजों पर क्यों नहीं कर सकते।
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