तेजबहादुर सप्रू प्रख्यात कानूनविद् और कांग्रेस के बड़े नेता थे। वह मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र और उन राज्यों में जहां उनकी आबादी अधिक है। वहां अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग के विरुद्ध थे। लखनऊ में 1916 में कांग्रेस का अधिवेशन था। उसमें भी यह प्रस्ताव रखा जाना था।
उस समय कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं ने सप्रू से आग्रह किया कि वह प्रस्ताव का विरोध न करें। नेताओं का कहना था कि इस समझौते से हिंदू-मुस्लिम एकता मजबूत होगी। जिससे अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' नीति सफल नहीं होगी। लिहाजा जब प्रस्ताव रखा गया तो सप्रू ने इसका विरोध नहीं किया प्रस्ताव पारित हो गया।
एके बोस की पुस्तक के अनुसार सप्रू ने कहा यदि मुस्लिम समुदाय यह समझता है कि अलग प्रतिनिधित्व से उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति हो जाएगी तो सैद्धांतिक रूप से इसके विरूद्ध होते हुए भी मैं इसका विरोध नहीं करूंगा। पर, मुझे लग रहा है कि यह समझौता बहुत उम्मीद बांधने वाला नहीं है।
मुस्लिमों के हित में भी नहीं है। बोस लिखते हैं कि सप्रू की आशंका सही साबित हुई आगे चलकर मुस्लिम लीग ने उन प्रांतों में अधिक स्वायत्ता की मांग उठाई, जिसमें वह बहुमत में थी। इस मांग ने केंद्र की स्थिति कमजोर बना दी, जिसकी परिणति देश के विभाजन के रूप में सामने आई। अगर सप्रू की बात मान ली जाती तो शायद देश न बंटता