जब चोरी कांड का खुलासा हुआ, तभी से एक नैरेटिव बनाया जा रहा है कि इसमें सिर्फ कर्मचारियों की भूमिका है। उनके घरों से रकम बरामद हुई है। यह इसलिए किया जा रहा है, जिससे ठीकरा इन्हीं कर्मचारियों पर फोड़ा जा सके। इतनी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था को भेदना इन कर्मचारियों की क्षमता से परे लगता है। अंदेशा है कि रकम को बाकायदा मंदिर परिसर से बाहर निकाला जाता था, जिससे उनकी कोई जामा-तलाशी न हो सके। यही वजह है कि आसानी से रकम पार होती रही।
एसआईटी ने जांच शुरू कर दी है। जांच में तमाम दान संबंधी रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज आदि ट्रस्ट ही उसे उपलब्ध करा रहा है। इसके आधार पर एसआईटी जांच करेगी। अब सवाल उठता है कि जब ट्रस्ट के पदाधिकारियों पर ही सवाल व आरोप लग रहे हैं तो क्या यह संभव है कि वे ऐसे साक्ष्य देंगे, जिनसे वे खुद फंस जाएं? यह संभव नहीं लगता। अगर इन पदाधिकारियों के दिए साक्ष्यों के आधार पर जांच पूरी होगी तो बड़े जिम्मेदार मौज करेंगे और सिर्फ दिखाने के लिए छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर दी जाएगी।
मामले में यदि केस दर्ज कर निष्पक्ष जांच हो तो कई बड़े लोग नप सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि एसआईटी अपने स्तर से मामले की तह तक जाए। केस दर्ज कराए और विवेचना के दौरान पुख्ता साक्ष्य जुटाए। अब देखना होगा कि एसआईटी जांच को कहां तक ले जाती है। क्या बड़े लोग बचेंगे या वे भी जांच के दायरे में आएंगे। इसकी संभावना कम है। आखिर में कहा जाएगा कि जांच एसआईटी से कराई गई, जो शामिल थे उन पर कार्रवाई की गई। इससे बड़े बच भी जाएंगे और मामला भी रफादफा हो जाएगा।