अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिलाने की आजम खां की मुहिम परवान चढ़ती नहीं दिखाई दे रही है। इससे संबंधित बिल को राज्यपाल राम नाईक ने रोक लिया है।
राजभवन इसकी संवैधानिकता के साथ-साथ औचित्य पर भी सवाल उठा रहा है। फिलहाल इस बिल को मंजूरी मिलने के आसार कम ही दिखाई दे रहे हैं।
बीएल जोशी के इस्तीफे के बाद एक महीने के लिए उत्तराखंड के साथ-साथ यूपी के राज्यपाल का पदभार संभालने वाले अजीज कुरैशी ने रामपुर स्थित मो. मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने संबंधी बिल को हरी झंडी देकर आजम की मुराद पूरी कर दी थी, लेकिन अब अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन का रुतबा बढ़ाने के लिए उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने की उनकी कोशिशों पर पानी फिरता दिखाई दे रहा है।
इसलिए राज्यपाल को है आपत्ति
राजभवन के सूत्रों का कहना है कि अल्पसंख्यक आयोग बिल का कानूनी विशेषज्ञों से संवैधानिक दृष्टि से परीक्षण कराया जा रहा है। इस बिल को लेकर कई सवाल पैदा हो रहे हैं।
जहां तक कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने की बात है तो यह केवल उन्हीं को दिया जा सकता है जो संवैधानिक पद हैं। अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन का पद संवैधानिक नहीं है और इस पर नियुक्ति राज्य सरकार करती है, इसलिए इसे कैबिनेट मंत्री का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने से विसंगति पैदा होगी क्योंकि अनुसूचित जाति आयोग, महिला आयोग तथा अन्य आयोगों के अध्यक्षों को राज्यमंत्री का ही दर्जा मिला हुआ है। ऐसे में सभी आयोग एक ही स्तर पर नहीं रह जाएंगे और भेदभाव पैदा होगा जो न्यायसंगत नहीं है।
इसके पीछे आखिर मंशा क्या है?
सूत्रों का कहना है कि जब दिल्ली व अन्य राज्यों में अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा नहीं मिला है तो यहां देने के पीछे क्या मंशा है? इसके लिए अध्यादेश जारी किए जाने पर भी राजभवन को आपत्ति है।
राजभवन का मानना है कि अध्यादेश तभी जारी किया जा सकता है जब आकस्मिकता हो या जनहित में बहुत जरूरी हो। इस मामले में दोनों ही बातें नहीं हैं। विधानमंडल में विधेयक क्यों नहीं पेश किया गया?
यह कहना है यूपी के गवर्नर का
इस पर अपनी राय देते हुए उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक का कहना है कि अल्पसंख्यक आयोग बिल को लेकर कई बिंदु सामने हैं। चूंकि आयोग का अध्यक्ष कांस्टीट्यूशनल अथॉरिटी नहीं है, इसलिए उसे कैबिनेट मंत्री का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
इससे विसंगति पैदा होने की आशंका है। इस बारे में संवैधानिक प्रावधानों के तहत सारे पहलुओं का बारीकी से परीक्षण कराने के बाद ही कोई निर्णय किया जाएगा।