दीक्षांत समारोह में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने विद्यार्थियों को मेडल बांटे।
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उन्होंने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि दिव्यांगता अभिशाप नहीं प्रसाद है। मैं कभी 99 फीसदी से कम अंक नहीं लाया। 9 स्वर्ण पदक प्राप्त किए। जेआरएफ-पीएचडी की, 14 पीएचडी करवाई। 210 किताबें लिखीं लेकिन खुद को विश्वविद्यालय की चहारदिवारी में नहीं बांधा।
मैनें 2001 में श्री रामभद्राचार्य दिव्यांग विवि की चित्रकूट में स्थापना की। जहां विकलांगों को सामान्य छात्रों के बराबर खड़ा किया जा रहा है। मैं तब तक विश्राम नहीं करूंगा, जब तक प्रत्येक दिव्यांग अपने पैरों पर नहीं खड़ा हो जाता। उन्होंने कहा कि मेरा सपना तब पूरा होगा जब कोई दिव्यांग देश का प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति बनेगा।
रामभद्राचार्य ने कहा कि दिव्यांग कभी बेरोजगार नहीं रह सकता। किंतु इसके लिए गलत रास्ता न चुने। उन्होंने शिक्षकों से भी अपील की शिक्षा का धर्म सिर्फ अपने परिवार-परिचितों को आगे बढ़ाना नहीं बल्कि इसका प्रयोग राष्ट्र के लिए करें। उन्होंने आह्वान किया कि पितृ देवो भव:, मातृ देवो भव:, गुरु देवो भव:, अतिथि देवो भव: में एक और जोड़े, राष्ट्र देवो भव:।
समारोह की अध्यक्षता राज्यपाल व कुलाध्यक्ष आनंदीबेन पटेल ने की। समारोह में विशिष्ट अतिथि दिव्यांगजन सशक्तीकरण एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के मंत्री अनिल राजभर, कुलपति प्रो. राणा कृष्णपाल सिंह व अपर मुख्य सचिव महेश गुप्ता आदि उपस्थित थे।
स्वामी रामभद्राचार्य ने बताया कि अगले वर्ष श्री रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय चित्रकूट में दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए मेडिकल कॉलेज भी खोलेंगे। दिव्यांगों को प्रोफेसर, इंजीनियर, डॉक्टर बनाना है। दिव्यांगों में ऐसी ऊर्जा भरनी है कि वे देश के लिए कुछ कर सकें। उन्होंने कहा कि मैं ऊं शांति, शांति, शांति में विश्वास नहीं करता हूं। मैं ऊं क्रांति, क्रांति, क्रांति में विश्वास करता हूं।
112 पदकों में 75 पदक छात्राओं के नाम
- कुल 112 पदक दिए गए
- 75 पदक छात्राओं ने प्राप्त किए
- 37 पदक छात्रों ने प्राप्त किए
- 85 छात्र-छात्राओं को मिले पदक
- इसमें 58 छात्राएं, 27 बालक शामिल
- कुल 6 दिव्यांग विद्यार्थियों को मिले पदक
- 42 स्वर्ण, 35 रजत, 35 कांस्य पदक