110 किलोमीटर प्रति घंटा रफ्तार से दौड़ने वाली डबल डेकर ट्रेन के दुर्घटनाग्रस्त होने पर पलटने का भय नहीं होगा।
इसकी सभी बोगियां सेंट्रल बफर कपलर (सीबीसी) से आपस में मजबूती से जुड़ी होगी।
रेलवे ने ही डबल डेकर के सीबीसी का डिजाइन तैयार किया है। पहला सीबीसी कपलर वाला डबल डेकर की 12 बोगियों का रैक रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला ने पूर्वोत्तर रेलवे को आवंटित किया है।
इस ट्रेन में 1300 यात्री सुरक्षा के साथ अपना सफर कर सकेंगे। दरअसल, रेलवे दो साल पहले तक सेंट्रल बफर कपलर तकनीक मालगाड़ियों में इस्तेमाल करता था।
इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये बोगियों को आपस में इतनी मजबूती से जोड़कर रखती हैं कि दुर्घटना के समय वे एक-दूसरे से अलग नहीं होती।
जुलाई, 2013 में निगोहां स्टेशन के पास हरिद्वार-इलाहाबाद एक्सप्रेस की तीन बोगियां पटरी से उतरकर सिग्नल पोस्ट और पुलिया से टकरा गई थी, लेकिन सीबीसी होने के कारण वापस आ गई थी।
इससे एक बड़ा हादसा होने से टल गया था।
दो साल पहले बिहार में नक्सली हमले के दौरान राजधानी एक्सप्रेस की सात बोगियां पटरी से उतर गई थी। इसमें भी सीबीसी होने की वजह से बोगियां सही सलामत रही।
इसे देखते हुए रेलवे ने लखनऊ मेल और काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस में भी सीवीसी कपलर लगाए हैं।
हालांकि सीबीसी के कारण ट्रेन के छूटने के समय यात्रियों को झटका महसूस होता है। अब रेलवे डबल डेकर ट्रेनों में भी इसी सीबीसी का प्रयोग करेगा।
और स्पीड बढ़ने की संभावना
रेलवे ने डबल डेकर ट्रेनों की गति सीमा अधिकतम 110 किलोमीटर प्रति घंटा निश्चित की है।
ऐसा इसलिए क्योंकि भारत में आगरा-झांसी रेलखंड को छोड़कर कहीं भी 150 किलोमीटर प्रति घंटे की क्षमता से ट्रेनें चलाने वाली पटरियां नहीं है।
आरडीएसओ ने जुलाई 2012 में आगरा-झांसी के बीच डबल डेकर के एक प्रोटोटाइप कोच को 160 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से दौड़ाकर उसका ट्रायल किया था।
इस ट्रेन की गति सीमा पटरियों की क्षमता के अनुसार और अधिक बढ़ाई जाएंगी। इसी के मद्देनजर रेलवे ने सेंट्रल बफर कपलर का डिजाइन बनाया है।
सीबीसी मेल एक्सप्रेस ट्रेनों की तरह बोगियों के पहियों के ऊपरी हिस्सों में नहीं बल्कि निचले हिस्सों में लगेंगे। ऐसे में कपलिंग के खुलने की संभावना भी नहीं होगी।