राहुल गांधी को पीएम पद के लिए प्रोजेक्ट न कर सिर्फ चुनाव अभियान अगुवा बनाने के कांग्रेस के फैसले से यूपी की सियासी तस्वीर में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है।
लेकिन एक बात साफ है कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव में रक्षात्मक खेलना चाहती है। साथ ही राहुल को आगे के लिए सुरक्षित रखना चाहती है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मुद्दों को उछालना और फिर उसका प्रभाव आंककर पलटी मार जाना कांग्रेसी रणनीति का हिस्सा रहा है।
इस मामले में भी कांग्रेस के रणनीतिकारों ने पहले राहुल को नरेन्द्र मोदी की टक्कर में उतारने का संकेत दिया। पर, जब रायबरेली और अमेठी के साथ-साथ पूरे यूपी में बहुत उत्साहजनक असर नहीं दिखा तो पीछे हट गई।
वैसे यह पहला मौका नहीं है जब राहुल को लेकर कांग्रेस ने यू टर्न लिया हो। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तो हालांकि परंपराओं की दुहाई देकर राहुल को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित करने से इन्कार किया है।
पर, राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि यह सोची समझी रणनीति है। सोनिया-राहुल जानते हैं कि उनके एक-एक फैसले का सबसे ज्यादा असर यूपी में पड़ता है।
न सिर्फ सोनिया बल्कि कांग्रेस के रणनीतिकार राहुल को ट्रंप कार्ड के रूप में बचाकर रखना चाहते हैं। जिससे आगे राहुल को उतारकर कांग्रेस की उम्मीदें बनी रहें।
इसलिए तो नहीं हुआ फैसला
कांग्रेस को उम्मीद थी कि राहुल को पीएम प्रोजेक्ट करने से वह युवाओं को आकर्षित करके यूपी में अपनी सीटों में इजाफा कर लेगी। पर, इस तरह का फीडबैक नहीं आया। उल्टे संकेत मिला कि यह फैसला बैकफायर कर सकता है।
राहुल पर फेल नेता होने का धब्बा लग सकता है। जो आगे की उम्मीदों पर पानी फेर देगा। इसी के बाद राहुल को किंग बनने की दौड़ में शामिल करने के बजाय ‘किंग मेकर’ के चेहरे के तौर पर ही उतारने का निर्णय कर दिया गया।
रणनीतिकारों का लगा कि जब कोई बड़ा लाभ नहीं दिख रहा है तो राहुल को दांव पर लगाने से क्या फायदा। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर सुरेन्द्र प्रताप कहते हैं कि कांग्रेस को यूपी में लोकसभा चुनाव में सफलता को लेकर संदेह है।
इसलिए राहुल को सेफ साइड रखने के लिए ही उन्हें पीएम पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया। उन्हें उम्मीदवार बनाने के बाद कांग्रेस हारेगी तो राहुल के नेतृत्व पर सवाल उठेगा।
उनकी राय में लोकसभा चुनाव के नतीजों पर इससे बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ने जा रहा है कि राहुल किस भूमिका में रहेंगे। पूरा देश जानता है कांग्रेस में गांधी परिवार की हैसियत सर्वोच्च है।
लेकिन कांग्रेसी गदगद
इस सबके बावजूद कांग्रेसी गद्गद है। इनका कहना है कि राहुल ने जिस तरह नरेन्द्र मोदी और अन्य विरोधियों को जवाब दिया,उससे राहुल के भाषण में गंभीरता और गहराई दिखी।
कांग्रेसियों को लगता है कि राहुल अब ज्यादा स्वतंत्र होकर कांग्रेस के चुनाव प्रचार को धार दे सकेंगे। राजनीतिक समीक्षकों का तर्क है कि राहुल वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भी यूपी में बहुत सक्रिय थे।
चूंकि कांग्रेस के पास प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं था इसलिए पार्टी का एक छोटा खेमा चाहता था कि राहुल को यूपी में मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया जाए।
यहां का मुख्यमंत्री स्वाभाविक तौर पर प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना जाता है। पर, राहुल गांधी और कांग्रेस इससे बचते रहे। विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद रणनीतिकारों को लगा कि राहुल का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार न घोषित कर उन्होंने ठीक ही किया था।