पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी हिंदी के एक कर्मठ योद्धा थे। उनकी साहित्यिक
रचना मौज की थी।
साहित्यिक रचना के लिए पारिश्रमिक की आकांक्षा उन्होंने
कभी नहीं रखी। हिंदी भाषा के लिए निरंतर प्रयासरत व संघर्षरत रहे। उनका
कार्यक्षेत्र भी काफी व्यापक रहा।
पंडितजी साहित्य के ऐसे वट वृक्ष बनकर
उभरे, जिनके नीचे कई साहित्यकार पनपे। पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी जयंती के
मौके पर शुक्रवार को हिंदी संस्थान में आयोजित संगोष्ठी समारोह में ये
बातें वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सरला शुक्ल ने कहीं।
निदेशक
उप्र हिंदी संस्थान डॉ. सुधाकर अदीब ने कहा कि चतुर्वेदी का व्यक्तित्व
व्यापक था। वे संपादक, विचारक व साहित्य मनीषी थे। उन्होंने ‘पावन संस्मरण‘
पुस्तक से तमाम ख्याति प्राप्त साहित्यकारों के बारे पं श्रीनारायण
चतुर्वेदीजी द्वारा लिखे रोचक संस्मरण सुनाए।
संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष
उदय प्रताप सिंह ने डॉ. नुसरत नाहीद की कृति ‘लोहिया एक परिचय‘ का
लोकार्पण किया।
साथ ही वर्ष 2012 में प्रकाशित व्यंग्य विद्या की कृति
‘अपने यहां सब चलता है‘ के लिए पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी नामित पुरस्कार से
सूर्य कुमार पांडेय को सम्मानित किया।
इस मौके पर संस्थान की प्रकाशन
अधिकारी डॉ. अमिता दुबे, प्रधान संपादक अनिल मिश्र समेत तमाम मौजूद रहे।