अलग-अलग सड़कों के लिए होने वाले अनुबंध में रफनेस इंडेक्स अलग-अलग होता है। तकनीकी भाषा में इस रोड पर यह रफनेस 3000 बंप प्रति किलोमीटर होनी चाहिए। यानी तीन हजार मिलीमीटर यानी तीन मीटर प्रति किलोमीटर से ज्यादा रफनेस इंडेक्स नहीं होना चाहिए। यानी प्रति किलोमीटर में औसतन तीन मीटर से ज्यादा हल्के-फुल्के जर्क (झटके) भी नहीं लगने चाहिए।
एनएचएआई के अधिकारियों की मानें तो लखनऊ-कानपुर रोड पर 8 किलोमीटर यानी 8000 मीटर सड़क में गड्ढे मिले हैं, जिन्हें भरने के निर्देश कंपनी को दे दिए गए हैं। जबकि, अनुबंध कहता है कि 75 किलोमीटर सड़क पर किसी भी हालत में 225 मीटर से ज्यादा हिस्से में जर्क नहीं लगने चाहिए।
एनएचएआई के अधिकारियों के मुताबिक यह सड़क मानक से 35 गुना ज्यादा खराब है। नियमानुसार ऐसी स्थिति में निजी कंपनी पर पेनल्टी लगाई जा सकती है, लेकिन सबकुछ जानते हुए भी एनएचएआई के अधिकारी मौन हैं।
अनुबंध के अनुसार सड़क के अलग-अलग हिस्से का हर पांच साल पर नवीनीकरण आवश्यक है। इस अवधि से पहले खराब होने पर रफनेस इंडेक्स का पालन भी जरूरी है। एनएचएआई के रिकॉर्ड के मुताबिक, टोल वसूलने वाली कंपनी ने वर्ष 2017 तक 20 किलोमीटर को छोड़कर शेष भाग का नवीनीकरण कर दिया है।
मार्च 2020 तक 21 किमी से 42 किमी तक के सड़क का नवीनीकरण बाकी है। यह हिस्सा बंथरा से नवाबगंज के बीच स्थित है। वहीं, हकीकत यह है कि इस सड़क का बड़ा हिस्सा खराब है। डेली पैसेंजर भी बताते हैं कि सड़क मानक से सौ गुना ज्यादा खराब है। यहां सिर्फ करोड़ों रुपये टोल वसूलने पर ध्यान दिया जा रहा है। टोल प्लाजा पर भी इतने बड़े-बड़े स्पीड ब्रेकर लगा दिए हैं, जो कहीं से भी एनएचएआई के मानकों के अनुरूप नहीं हैं।
लखनऊ-कानपुर रोड के 8 किलोमीटर हिस्से में पैच मिले हैं। इन्हें ठीक कराया जा रहा है। सड़क को मानक के अनुरूप रखने के लिए कंपनी को निर्देश दे दिए गए हैं। - एनएन गिरी, परियोजना निदेशक, एनएचएआई