तोगड़िया से पहले भी संघ परिवार के कई चेहरों ने बगावती कदम उठाए। इनमें कुछ तो वापस मूल विचारधारा के साथ आ गए। कुछ नहीं आए, लेकिन किसी की बगावत बड़ी कामयाबी का मिसाल नहीं बन पाई। सबसे चर्चित उदाहरण 1973 का है।
कानपुर में जनसंघ का अधिवेशन था, जिसमें लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का फैसला हुआ। बलराज मधोक ने इस फैसले का विरोध किया, पर आडवाणी अध्यक्ष हो गए। मधोक बागी हो गए। उन्होंने अंतिम सांस तक संघ और भाजपा का विरोध किया, लेकिन बड़ी सफलता नहीं मिली।
मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद कल्याण सिंह ने भी बगावत की राह पकड़ी। उन्होंने दो बार भाजपा छोड़ी और पार्टी बनाई, पर बहुत कामयाब नहीं हो पाए। आखिरकार वह लौटकर भाजपा में ही आ गए। अब राजस्थान के राज्यपाल हैं। नेतृत्व के फैसलों से असहमत होने पर उमा भारती ने भी बगावत की राह पकड़ी।
उन्होंने अयोध्या तक ‘राम रोटी यात्रा’ निकाली और सरयू के तट पर भाजपा का विकल्प खड़ा करने की घोषणा की। पर, उनकी भी बागी राह बड़ा मुकाम नहीं हासिल कर पाई। वह भी भाजपा में लौट आईं। मदनलाल खुराना का भी उदाहरण है।
अलबत्ता एक उदाहरण बाबूलाल मरांडी का जरूर है जो तोगड़िया की उम्मीद बंधा सकता है। पर, मरांडी की परिस्थितियां अलग थीं। हालांकि मरांडी भी बगावत के बाद पहले चुनाव में ही थोड़ा-बहुत असर दिखा पाए, लेकिन अकेले दम पर झारखंड में भाजपा का विकल्प नहीं बन पाए।