आयोग के सूत्रों का कहना है कि पिछले साल बिजली कंपनियों के लिए लाइन हानियां 11.96 फीसदी तक लाने का लक्ष्य रखा गया था। इस साल का टैरिफ तय करते समय आयोग ने इसी को आधार माना है। साथ ही शत-प्रतिशत राजस्व वसूली का भी लक्ष्य रखा है।
आयोग ने अपने पिछले टैरिफ ऑर्डर में ही साफ कर दिया था कि वह तय लाइन हानियों व शत प्रतिशत राजस्व वसूली मानते हुए ही दरों का निर्धारण करेगा। अगर बिजली कंपनियां आयोग द्वारा तय मानदंडों को पूरा करती हैं तो निश्चित तौर पर मुनाफे में रहेंगी। आयोग बिजली कंपनियों की अक्षमता का बोझ उपभोक्ताओं पर डालने के पक्ष में नहीं है।
दूसरी तरफ पावर कॉर्पोरेशन के अधिकारियों का कहना है कि एआरआर में काफी कटौती की गई है। आयोग ने दरों का निर्धारण और एआरआर का अनुमोदन करने की प्रक्रिया में बीते वर्षों में शासन से प्रस्तावित सब्सिडी की उस राशि को भी शामिल कर लिया है जो प्राप्त ही नहीं हुई है। इससे बिजली कंपनियों की बैलेंसशीट में तो धनराशि जुड़ गई है लेकिन वास्तव में वह मिली नहीं है।
साल दर साल दरें बढ़ाने के बाद भी बिजली कंपनियों की माली हालत न सुधरने की मुख्य वजह भारी लाइन हानियां और खराब राजस्व वसूली है। पावर कॉर्पोरेशन प्रबंधन की तमाम कोशिशों के बावजूद बिजली कंपनियां लाइन हानियां कम करने और राजस्व वसूली बढ़ाने में कामयाब नहीं हो पा रही हैं।
लाइन हानियां अब भी 25-30 फीसदी से ऊपर हैं, जबकि बहुत से प्रदेशों में यह 15 फीसदी तक आ चुकी है। इसी तरह काफी खींचतान के बाद राजस्व वसूली 80-90 फीसदी तक ही हो पा रही है।