यूपी में नई सरकार बनाने के लिए विधानसभा चुनाव की दुंदुभी बज चुकी है। सत्ता संग्राम में हिस्सा लेने वाले राजनीतिक दलों की सक्रियता में अब और तेजी आएगी।
पर, चुनाव को लेकर मुख्य राजनीतिक दलों की अब तक की तैयारी की बात करें तो साढ़े चार साल तक सूबे की सत्ता पर राज करने वाली सपा विभाजन के दौर से गुजर रही है। उसके कार्यकर्ता सबसे ज्यादा असमंजस में हैं।
कांग्रेस अभी तक गठबंधन की उम्मीद में प्रत्याशी पर ठोस विचार नहीं शुरू कर पाई है। रही भाजपा और बसपा की बात, तो इन दोनों दलों की चुनावी समर में उतरने की तैयारी पूरी नजर आ रही है। कौन दल कितना तैयार है, बता रहे हैं महेंद्र तिवारी--
सपा : अभी तो विभाजन के दंश से ही झुलस रही
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व सपा सुप्रीमो मुलायम
- फोटो : amar ujala
समाजवादी पार्टी सूबे की सत्ताधारी पार्टी है। पर, पार्टी चुनाव की घोषणा के वक्त पर भी अपने सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। पार्टी विभाजन की कगार पर है और उसके पहरुए चुनाव की तैयारी छोड़कर दल और निशान को कब्जाने की लड़ाई में उलझे हुए हैं।
मुलायम मंडलीय रैलियों का एलान करने के बावजूद पारिवारिक कलह में दो रैलियों से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। मुलायम ने जो रैलियां की, अखिलेश उसमें शामिल नहीं हुए। मुख्यमंत्री ने अपनी अलग राह का संकेत करते हुए समाजवादी विजय रथ यात्रा का एलान किया, लेकिन वह भी लक्ष्य से भटक गई।
करोड़ों रुपये खर्च कर रथ तैयार कराने के बावजूद मुख्यमंत्री विकास से विजय की रथ यात्रा आगे नहीं बढ़ा पाए हैं। कलह इतनी आगे बढ़ चुकी है कि मुलायम और अखिलेश अलग-अलग प्रत्याशियों का एलान कर चुके हैं। इस वक्त जब प्रत्याशियों को अपने-अपने क्षेत्र में मतदाताओं के बीच होना चाहिए, ज्यादातर प्रत्याशी सब कुछ ठीक होने की उम्मीद में लखनऊ में डेरा डाले हुए हैं।
सपा की अगली रणनीति पर निगाहें टिकीं
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव
- फोटो : amar ujala
उन प्रत्याशियों की स्थिति समझी जा सकती है जो दोनों गुटों के प्रत्याशियों की सूची में शामिल हैं। बिगड़ी बनने की उम्मीद पाले पार्टी वर्कर मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच रार रिश्ते के पार जाते देख लहलहाती फसल बर्बाद होने की आशंका में परेशान हैं। अब जबकि चुनावी दुंदुभी बज चुकी है, सपा की अगली रणनीति पर लोगों की निगाहें टिकी हैं।
ताकत-
- मुख्यमंत्री अखिलेश के विकास संबंधी काम
- सूबे के राजनीतिक नेतृत्व में सबसे युवा चेहरा
- बदलाव को तैयार, प्रोग्रेसिव रास्ते पर बढ़ना
- अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे अपराधी छवि के लोगों से दूरी दिखाने की कोशिश
कमजोरी-
- सपा में पारिवारिक कलह का विभाजन की कगार पर पहुंचना
- गायत्री प्रजापति, मुकेश श्रीवास्तव जैसे विवादास्पद छवि के लोगों पर दरियादिली
- बसपा नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्रवाई न करना
- मुस्लिमों को आरक्षण, जेलों में बंद आरोपियों की रिहाई जैसे वादों पर अमल न होना
भाजपा : मथ डाला यूपी, परिवर्तन का शंखनाद
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह
- पहले चरण के नामांकन की शुरुआत के ठीक पहले प्रत्याशियों का एलान
सूबे में पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो तीसरे नंबर पर रही भाजपा तैयारी के लिहाज से सबसे आगे है। पार्टी ने चुनाव के पहले 198 दिन की परिवर्तन यात्रा निकालने के अलावा जिलों-जिलों में युवा, महिला व पिछड़ा वर्ग सम्मेलनों के आयोजन का काम पूरा कर लिया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सूबे में छह बड़ी परिवर्तन रैलियां कर चुके हैं।
लखनऊ में भाजपा की सबसे बड़ी रैली में भी प्रधानमंत्री शामिल हुए। यह रैली चुनावी तैयारी के लिहाज से इस मायने में अहम रही कि इसमें प्रदेश के लगभग सभी बूथों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को जुटाया गया। प्रधानमंत्री इन कार्यकर्ताओं में जोश भर कर लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में भी पूर्ण बहुमत की सरकार का वादा लेकर गए हैं।
भाजपा की चुनाव तैयारी में पर्दे के पीछे से आरएसएस की पूरी फौज फील्ड में उतर चुकी है और विद्यार्थी परिषद जैसे अन्य सहयोगी संगठन भी जुटे हुए हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता कई बार साफ कर चुके हैं कि प्रत्याशियों के नाम फाइनल हैं।
चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद इनके एलान कर दिए जाएंगे। माना जा रहा है कि भाजपा खरमास के बाद और रणनीति के तहत पहले चरण के नामांकन की शुरुआत के ठीक पहले प्रत्याशियों का एलान कर सकती है।
ये है ताकत और ये कमजोरी
- बूथ तक मजबूत संगठन, आक्रामक चुनाव प्रबंधन
- प्रधानमंत्री सहित कई बड़े चेहरे चुनाव में प्रचारक
- केंद्र की सत्ता में होना और सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी जैसे फैसले
- लोकसभा चुनाव की 80 सीटों में से 71 पर जीत से मनोबल बढ़ा होना
विरोध में -
- चुनाव के लिए सीएम का चेहरा न होना
- नोटबंदी के फैसले से लोगों को हुई परेशानी
- ज्यादा बाहरी लोगों को टिकट मिलने से कार्यकर्ताओं में नाराजगी की आशंका
- पार्टी में अभी भी आंतरिक गुटबाजी
बसपा : तैयारी पूरी, समीकरण पर सारा दारोमदार
- फोटो : amar ujala
- प्रत्याशियों का कभी भी हो सकता है एलान
2007 के बाद से बसपा अच्छे दिन के लिए तरस रही है। यह विधानसभा चुनाव पार्टी के लिए बेहद अहम है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने चुनाव की पूरी तैयारी अपनी देखरेख में कराई है। बूथ स्तर तक संगठन का गठन हो चुका है।
एक-एक विधानसभा क्षेत्र को कई-कई सेक्टरों में बांटकर खुली सभाओं का काम पूरा हो गया है। मायावती भी क्षेत्रीय स्तर पर चार रैलियां कर चुकी हैं। मंडल स्तर पर पिछड़ा वर्ग सम्मेलन हो रहे हैं। पार्टी ने सपा में मचे पारिवारिक कलह का फायदा उठाकर मुसलमानों को अपने पाले में लाने पर पूरा ध्यान लगा दिया है।
भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए मायावती दलित-मुस्लिम गठजोड़ की ताकत बताने में जुटी हुई हैं। बसपा अकेली ऐसी पार्टी है जिसने काफी पहले विधानसभा क्षेत्रवार प्रत्याशी फाइनल कर दिए हैं।
हालांकि ज्यादातर सीटों पर कई-कई बार प्रत्याशी बदले भी गए हैं। पर, पार्टी के प्रत्याशियों की फाइनल सूची भी तैयार है। मायावती ने इसे जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर सजाया है। इसमें ब्राह्मणों-पिछड़ों की पूछ कम की है तो मुस्लिमों का महत्व बढ़ाया है। बसपा सुप्रीमो अपने जन्मदिन 15 जनवरी को या इसके पहले कभी भी प्रत्याशियों के नाम का एलान कर सकती हैं। इसके बाद उनके चुनावी कार्यक्रम भी शुरू हो जाएंगे।
ये है बसपा की ताकत व कमजोरी
1- सीएम के चेहरे के रूप में कड़क छवि की मायावती का होना
2- पार्टी के संगठन और प्रत्याशी चयन में एकाधिकार
3- अपने विरोधियों के खिलाफ आक्रामक छवि
4- दलितों में अभी भी प्रभाव कायम
कमजोरी-
1- रैली करने वाली अकेली नेता। दूसरी लाइन के नेताओं को आगे न बढ़ने देना
2- कई-कई बार प्रत्याशियों में बदलाव। बदले गए प्रत्याशी कर सकते हैं भितरघात।
3- 2007 के विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव में पूरी तरह सफाया।
4- पिछले एक साल के भीतर बसपा के कई जिम्मेदार नेताओं का भाजपा में जाना।
कांग्रेस : गठबंधन के असमंजस में उलझी तैयारी
- प्रत्याशी चयन की कार्रवाई तक शुरू नहीं
27 साल से यूपी में बेहाली के दौर से गुजर रही कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी विधानसभा चुनाव में पार्टी का माहौल बनाने के लिए किसान यात्रा और खाट सभाएं कर चुके हैं। पार्टी ने दलितों में पैठ बढ़ाने के लिए दलित चेतना यात्रा भी निकाली। चुनाव के लिए सूबे के संगठन में प्रदेश अध्यक्ष से लेकर प्रदेश प्रभारी तक बदले।
निर्मल खत्री की जगह राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष और मधुसूदन मिस्त्री की जगह, गुलाम नबी आजाद को प्रदेश प्रभारी बनाया। प्रदेश के चुनाव में अपनी गंभीरता दिखाने के लिए कांग्रेस ने अपना सीएम चेहरा भी सामने किया।
जातीय समीकरण पर ध्यान देते हुए पार्टी ने ब्राह्मण परिवार की बहू और तीन बार दिल्ली प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं बुजुर्ग शीला दीक्षित को आगे किया। पर, इतना कुछ करने के बावजूद कांग्रेस अब तक यह तय नहीं कर पाई है कि यूपी में चुनाव किस तरह लड़ना है। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को यूपी लाने का प्रयोग भी सफल नजर नहीं आया।
प्रियंका वाड्रा पर भी स्थिति साफ नहीं
प्रियंका वाड्रा
- फोटो : amar ujala
पार्टी अभी तक प्रत्याशियों के चयन का काम शुरू नहीं कर पाई है। कई बार संकेत करने के बावजूद यह साफ नहीं कर पाई है कि राहुल के साथ प्रियंका वाड्रा भी चुनाव में मोर्चा संभालेंगी या नहीं। कांग्रेस और अखिलेश यादव के खेमे के बीच गठबंधन को लेकर शुरू हुई अटकलें अभी तक जारी हैं।
ये हैं कांग्रेस की ताकत
1- राहुल गांधी की भाजपा के खिलाफ आक्रामक छवि
2- सपा से गठबंधन होने पर कुछ फायदे की संभावना
3- पहले से आक्रामक छवि का प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी
4- खोने को ज्यादा नहीं, पाने की ही आस
कमजोरी -
1- प्रदेश में पार्टी का बड़ा आधार न होना
2- दिल्ली केंद्रित राजनीति करने वाले नेताओं पर प्रदेश संगठन की जिम्मेदारी
3- बुजुर्ग महिला नेता को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से भी आकर्षण न बढ़ा पाना
4- पिछले कई चुनावों से लगातार मिल रही हार