प्रदेश में कई दशकों तक शासन करने वाली कांग्रेस के लिए यह साल सिर्फ भविष्य की चुनौतियां बढ़ाने के लिए याद किया जाएगा। तमाम प्रयोगों के बावजूद हर साल जमीन खोती कांग्रेस इस साल भी झटका खाती दिखी। प्रियंका गांधी के प्रदेश में कांग्रेस की जमीन तैयार करने का प्रयोग भी बेअसर दिखा। साल-दर साल विधानसभा में सिमटती कांग्रेस इस साल हुए विधानसभा चुनाव में और नीचे लुढ़ककर सिर्फ दो विधायकों पर पहुंच गई। केंद्रीय नेतृत्व राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को लेकर लंबे समय तक ऊहापोह में फंसा रहा तो प्रदेश में भी कांग्रेस उसी राह पर हिचकोले खाती नजर आई।
बसपा : अस्तित्व की जद्दोजहद
लोकसभा चुनाव 2019 में सपा के साथ गठबंधन कर दस सांसदों को जिताने के बाद बसपा प्रदेश में भविष्य में फिर बड़ी सियासी ताकत बनने की संभावनाओं को बलवती करते हुए दिखी थी। पर, विधानसभा चुनाव के नतीजों ने बसपा की संभावनाओं पर फिर सवालिया निशान लगा दिया। विधानसभा में बसपा सिर्फ एक सीट पर सिमट गई। भविष्य में उसे पांव जमाने में खासी जद्दोजहद करनी होगी।
आप : चर्चा में ज्यादा, जमीन पर कम
2014 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी में नरेंद्र मोदी के खिलाफ अरविंद केजरीवाल ने चुनाव लड़कर अपने दल आम आदमी पार्टी की यूपी में सियासी खेती की तैयारी का संकेत दे दिया था। पर, अभी तक उसे सफलता नहीं मिली है। आप के संजय सिंह ने कोविड के दौरान सरकार पर लगातार हमला बोलकर दिल्ली मॉडल के सहारे यूपी में पैर जमाने की कोशिश की। विधानसभा चुनाव में आप ने 403 सीटों में से 349 पर उम्मीदवार उतारकर भी लोगों के बीच अपनी उपस्थिति का संदेश देने का प्रयास किया। पर, पार्टी खास प्रदर्शन नहीं कर सकी।
छोटे दल : सौदेबाजी में सफल
संजय निषाद की निषाद पार्टी, अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाले अपना दल, ओमप्रकाश राजभर के नेतृत्व वाले सुभासपा जैसे छोटे दलों के लिए यह वर्ष खास रहा। भाजपा और सपा जैसी बड़ी पार्टियों के साथ गठबंधन करके इन दलों ने विधानसभा में सीटें ही नहीं बढ़ाईं बल्कि वोटों का प्रतिशत भी बढ़ाने में कामयाब रहे। भाजपा से गठबंधन तोड़कर सपा के साथ गए ओमप्रकाश राजभर ने इस बार पिछली बार से दो सीटें ज्यादा जीतकर कुल छह विधायक निर्वाचित कराए। संजय निषाद ने भाजपा से गठबंधन किया। पार्टी के छह विधायक निर्वाचित हो गए। वह खुद विधान परिषद में पहुंचने के साथ कैबिनेट मंत्री बनने में सफल रहे। अपना दल (सोनेलाल) का भी भाजपा के साथ गठबंधन सफल रहा। 2017 में पार्टी के 9 विधायक चुने गए थे। इस बार 12 निर्वाचित हुए। अनुप्रिया पटेल केंद्रीय मंत्रिमंडल में हैं। उनके पति आशीष सिंह को भी प्रदेश मंत्रिमंडल में जगह मिल गई।
विपक्ष को संदेश: विपक्ष के लिए 2022 का संदेश यह है कि राजनीति में हिंदुत्व की ताकत के प्राण तत्व अयोध्या, मथुरा और काशी की जमीन से जुड़े लोग अब अपने सरोकारों के साथ राजनीतिक ताकत का अहसास कराना सीख गए हैं। भाजपा उनकी अपेक्षा पर खरी उतरी है। इसलिए कभी इस तो कभी उस पार्टी तथा व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने के प्रयोग के बजाय उन्होंने भाजपा के रूप में स्थिर सरकार का संकल्प ले लिया है । किसी दल की स्वीकार्यता तभी होगी जब वे हिंदुत्व के सरोकारों को हृदय से सम्मान देंगे। तुष्टिकरण के बजाय दूसरों की आस्था का सम्मान लेकिन अपनी आस्था पर भी पूरा काम करने के संकल्प पर काम से ही वे जनविश्वास हासिल कर पाएंगे।