कहावत तो यह है कि दिल्ली दूर है। पर, जब से केंद्र में पार्टी की सरकार बनी है तब से भाजपाई इस कहावत को बदलने को आमादा है।
जिसे देखो वह दिल्ली में। कोई राज्यपाल बनने को तो कोई किसी अन्य पद की जुगाड़ में तो र्कोई संगठन में अपनी नई भूमिका की खोज में दिल्ली की ओर रुख किए हुए है।
हर नेता को लग रहा है कि अच्छे दिन आ गए हैं। पर, भाजपा कार्यालय में एक सज्जन ऐसे भी हैं जिनके लिए अच्छे दिनों की चाह एक दिलचस्प दर्द का सबब बन गई है।
रोज ट्रेन में सीट दिलाने की सिफारिश। एक फोन रखते नहीं है कि दूसरा आ जाता है, ‘भाई साहब! फला गाड़ी से रिजर्वेशन करा लिया है। सीट कन्फर्म करा दीजिएगा। बेचारे जवाब भी क्या दें।
अगर यह कहते हैं कि वह कैसे सीट कन्फर्म करा सकते हैं तो जवाब मिलता है, ‘अरे! क्या मजाक करते हैं, भाई साहब। पार्टी सत्ता में है।
एक फोन करा देंगे तो काम हो जाएगा। बेचारे! सिर धुन रहे हैं। कहते हैं, ‘भाई! अपने तो अच्छे दिन सत्ता से बाहर वाले ही थे।’