अयोध्या में परिक्रमा वाला बवाल चल रहा था तो नौकरशाहों के बड़े हाकिम कार्यक्रम बनाकर आगरा चले गए थे।
मुजफ्फरनगर दंगा हुआ तो विदेश चले गए। जब चुनाव का मौका आया तो फिर विदेश की फ्लाइट पकड़ ली।
हाकिम ने जैसे पहले ही तय कर लिया था कि चुनाव बाद नहीं रहना है, लिहाजा जब सरकार को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, वे गायब हो गए।
मगर उन्हें इस बात का अंदाजा शायद ही रहा होगा कि उन जैसे अफसर को सरकार इस तरह बेआबरू कर बाहर का रास्ता दिखा देगी। पर, चुनाव का नतीजा आया तो सरकार को सबक सिखाने में दिक्कत नहीं हुई।
उनसे भी ज्यादा मुश्किल में वे फंस गए जो छींका टूटने के इंतजार में न जाने कितने जतन कर चुके थे। उनकी सारी कुटिल चालें फेल हो गईं। बड़ी कुर्सी पर न खुद बैठ पाए और न प्रतिद्वंद्वी को मिलने से ही रोक पाए।