इस लोकसभा चुनाव से सबसे बड़ा सबक उन दलों को मिला है जो सियासी सौदेबाजी करने के लिए जाने जाते हैं। जिन्होंने जातीय आधार पर दल बना रखे हैं या सियासी चोला ओढ़कर अपने प्रभाव का इस्तेमाल पद व कद पाने के लिए करते रहते हैं।
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इन दलों को जनता ने पूरी तरह नकार दिया। इनमें सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओमप्रकाश राजभर, रालोद के चौधरी अजित सिंह तथा दलीय राजनीति के मैदान में उतरे रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया बुरी तरह नाकाम रहे।
सुभासपा : धरे रह गए राजभर के दावे
पूर्वांचल की सीटों पर प्रभावी संख्या में मौजूद राजभरों के साथ अन्य पिछड़ी जाति बिरादरी केवोट बैंक पर मजबूत पकड़ होने का दावा करने वाले सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर को लगा कि वह भाजपा से ज्यादा सियासी लाभ ले सकते हैं। उन्होंने भाजपा पर दबाव बनाने के लिए अलग होकर चुनाव लड़ा, लेकिन मामला नहीं बना।
सरकार से भी बाहर हुए और ईवीएम से निकले वोटों ने बिरादरी पर पकड़ होने के उनके दावों की पोल भी खोल दी। राजभर ने जिन 38 सीटों पर सुभासपा के उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की थी, उनमें से 19 पर ही उम्मीदवार मैदान में उतरे। इनमें भी 11 उम्मीदवारों ने ऐन मौके पर चुनाव लड़ने से मना कर दिया। लिहाजा राजभर को दोबारा उम्मीदवार उतारने पड़े।
सुभासपा का एक भी उम्मीदवार का चुनाव जीतना तो दूर, इस स्थिति में भी नहीं रहा कि भाजपा को नुकसान पहुंचा सके। राजभर ने जिस घोसी सीट के न मिलने पर भाजपा से रिश्ता तोड़ा था, वहां सुभासपा को सिर्फ 3.49 प्रतिशत वोट ही मिले। सलेमपुर में 3.64, बलिया में 3.63, गाजीपुर मे 3.06, चंदौली में 1.75, मछलीशहर में 1.08 और लालगंज में 1.87 प्रतिशत मत मिले। शेष सीटों पर इससे भी कम वोट मिले।
जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) : दोनों सीटों पर मात
सात बार से लगातार निर्दल विधायक रहते हुए भी सपा व भाजपा की सरकारों में मंत्री बनने वाले रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने पहली बार इस चुनाव में जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) नाम से नई पार्टी बनाकर दो उम्मीदवार उतारे थे, लेकि न एक भी उम्मीदवार नहीं जिता सके।
राजा भैया ने अपने दाहिने हाथ अक्षय प्रताप सिंह को प्रतापगढ़ से मैदान में उतारा था, लेकिन उन्हें मात्र 46,963 वोट मिले और जमानत भी गंवानी पड़ी। दूसरी सीट कौशांबी से उन्होंने पूर्व सांसद शैलेंद्र कुमार को चुनाव लड़ाया था, लेकिन वह 1,56,406 वोट पाकर भी तीसरे स्थान पर रह गए।
हालांकि उनकी जमानत बच गई। माना जा रहा था कि ये दोनों सीटें राजा भैया केप्रभाव क्षेत्र की हैं और इस क्षेत्र की विधानसभा सीटों पर राजा भैया केसमर्थन के बिना किसी का चुनाव जीतना आसान नहीं होता।
चौधरी चरण सिंह की कभी देश की सियासत में तूती बोला करती थी। राष्ट्रीय लोकदल का सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों में भी प्रभाव रहा, लेकिन पिछले दो लोकसभा चुनावों से प्रदेश में रालोद का खाता भी नहीं खुल पा रहा।
पश्चिमी यूपी के जाट लैंड के क्षत्रप माने जाने वाले रालोद अध्यक्ष अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी के लिए मौजूदा लोकसभा चुनाव बड़ा सबक दे गया है। रालोद को सिर्फ अपने सियासी वजूद की रक्षा के लिए इस्तेमाल करना पिता-पुत्र को भारी पड़ा।
कभी इस दल तो कभी उस दल के साथ खड़े होने वाले अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत ने इस बार सपा और बसपा गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। इसके बावजूद उनकी सियासी नैया पार नहीं लग सकी। पिता-पुत्र की यह लगातार दूसरी हार है। 2014 में भी दोनों को शिकस्त मिली थी।