सेंट फ्रांसिस स्कूल हजरतगंज के बाहर स्कार्पियो (यूपी 33 एजी 0295) से सिपाही अशोक कुमार सिंह और गनर अधीन कुमार सिंह किसी बच्चे को लेने आए हैं। कुछ देर गेट पर इंतजार करने के बाद बच्चा नजर आता है। सिपाही उसे आसपास की भीड़ से बचाते हुए कार तक लाते हैं।
दृश्य दो-
लॉ मार्टीनियर स्कूल के बाहर पैरेंट्स को धकियाता हुए एक सिपाही गेट पर पहुंचता है और बच्चे को लेकर नीले रंग की बुलेरो (यूपी 41 जी 0434) की तरफ बढ़ जाता है। बुलेरो कार में पहले से ही एक बच्चा बैठा है। दोनों बच्चों को बैठाकर ड्राइवर फर्राटा भरते हुए निकल जाता है।
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दृश्य तीन-
हजरतगंज में सेंट फ्रांसिस स्कूल के बाहर नीली बत्ती लगी सफेद अंबेसडर कार (यूपी 32 एयू 6666) से एक होमगार्ड बाहर आता है। सामने से आ रहे बच्चे का स्कूल बैग और पानी की बॉटल ले लेता है। वाहनों के बीच से जगह बनाते हुए उसे कार में बैठाकर आगे बढ़ जाता है।
थाना-चौकियों में लाते हैं चाय-नाश्ता व गुटखा
राजधानी में तैनात पुलिसकर्मी ड्यूटी कम अफसरों की बेगारी ज्यादा करते नजर आते हैं। स्कूलों के बाहर और शॉपिंग मॉल से लेकर पुलिस ऑफिस और थानों तक इनकी बेगारी के नजारे आम हैं।
कहीं सिपाही अपने अफसर के बच्चों का स्कूल बैग-वॉटर बॉटल उठाए घूम रहे हैं तो कहीं दरोगा शॉपिंग मॉल में अफसरों के परिवार को भीड़ से बचाते हुए मोल-तोल करते दिख रहे हैं। थाना-चौकियों में सिपाहियों से चाय-नाश्ता और गुटखा-सिगरेट मंगाने से भी गुरेज नहीं किया जाता।
पुलिसकर्मियों की बदहाली और बेगारी का जिक्र करने के लिए ये उदाहरण पर्याप्त हैं। राजधानी के थाना-चौकी से लेकर सीओ, एएसपी और पुलिस ऑफिस में तैनात करीब छह हजार के स्टाफ का बड़ा हिस्सा इसी बेगारी में लगा हुआ है।
पुलिस ऑफिस हो या थाना-चौकी, आसपास सजे खोमचों-ठेलों से पन्नी में चाय ले जाने के लिए कोई न कोई सिपाही खड़ा जरूर नजर आ जाएगा। एक अफसर का कहना है कि बेगारी के लोगों का अलग-अलग इस्तेमाल किया जाता है।
स्टाफ के सीधे-सादे या शारीरिक रूप से अशक्त लोगों को चाय-पानी-गुटखा मंगाने के काम में लगाया जाता है तो स्मार्ट व बातचीत में माहिर सिपाहियों को अफसरों के परिवार की सेवा में लगाया जाता है। होशियार और दबंग पुलिसकर्मी भी बेगारी से दूर नहीं रखे जाते। हालांकि, इनसे बेगारी कराने का तरीका अलग है।
एक अफसर बताते हैं कि ऐसे पुलिसकर्मियों को उन जगहों पर लगाया जाता है जहां अफसरों के आर्थिक लाभ निहित होते हैं। किसी से लेन-देन, बड़ी खरीदारी या फिर बिना लिखा-पढ़ी के होने वाले काम बेगारी की इस श्रेणी में आते हैं।
बेगार करने की भी रहती है होड़ अफसरों की बेगारी करने के लिए भी दरोगा-सिपाहियों में होड़ लगी रहती है। दरोगाओं को यह बेगारी थानेदार की कुर्सी तक पहुंचा देती है तो सिपाहियों को बेअंदाज और मनबढ़ बना देती है।
थानेदारों की बेगारी करने के लिए सिपाही हर वक्त तैयार रहते हैं, क्योंकि उन्हें आर्थिक और सामाजिक लाभ के साथ ही ड्यूटी के दौरान मनमानी का लाइसेंस मिल जाता है। अगर यही सिपाही किसी अफसर की बेगारी में भेज दिया जाए तो परेशान हो जाते हैं।
यही स्थिति दरोगाओं की है। सीओ से एएसपी और एसएसपी के लिए बेगार करने को तैयार रहते हैं लेकिन जहां इससे ऊपर के अफसरों का नाम आता है, वे कन्नी काट जाते हैं।